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नया साहित्य, नए सरोकार

विचार-चर्चानए समय में नए सवालों के सम्मुख नया चिंतन, नया साहित्य हमारे सामने है। इस साहित्य को, चिंतन को अलग-अलग दृष्टियों से समझने की कोशिश की जा रही है। यह साहित्य तेज़ी से बदल रहे सामाजिक परिदृश्य को परपक्वता से समझ रहा है और शिद्दत के साथ हमारे सामने पेश कर रहा है। इस साहित्य के विषय भी अलग हैं, शैली भी और कथा कहने के अंदाज़ भी नए हैं। इस साहित्य के नए पाठक की भी ज़रूरत है और इसे समझने वाले नए आलोचकों की भी। इस बार भास्कर के दफ्तर में विशेष बातचीत के लिए नौजवान कवि मदनवीरा, पमदीप, नौजवान कहानीकार अनेमन सिंह और देसराज काली ने नए साहित्य के परिदृश्य पर बातचीत की। पेश है इस बातचीत के कुछ अंश..

मदन वीरा: पिछले समय में साहित्य मैग्ज़ीनों के जो अंक प्रकाशित हुए हैं, जिनमें लकीर का 100वां अंक, सृजणा का विशेषांक, कहानीधारा का नॉवेल अंक और चिराग़ का पाकिस्तानी कविता विशेषांक शामिल हैं, ध्यान की मांग करते हैं। इन अंकों में प्रकाशित साहित्य में हम देखते हैं कि नॉवेल, कहानी, कविता के साथ-साथ गद्य भी नए सरोकारों से जुड़ रहा है। पंजाबी में नॉवेल को सिर्फ़ मालवा क्षेत्र तक सीमित समझा जाता था और इसके सरोकार सामंती जीवन प्रबंध तक सीमित थे। मगर अब नॉवेल उन सरोकारों से उभर कर नए समाज को समझने की कोशिश में है। कहानीधारा ने अपने ताज़ा अंक में दो नॉवेल ‘गिलीगुडु’ और ‘अंतहीण’ प्रकाशित किए हैं। इस अंक से पंजाबी में नॉवेल पर चर्चा शुरू हुई है। कहानी के क्षेत्र के साथ-साथ पिछले समय में पाली भुपिंदर और डॉ. स्वराजबीर के नाटकों पर भी विचार उतेजिक चर्चा चली है।

काली: जिस तरह मदन ने नॉवेल की बात की है, यहां मैं हमारे दोआबा क्षेत्र के नॉवेलकार प्रो. केवल कलोटी के नॉवेलों ‘घाटी पुतली गरां दी’ का ज़िक्र करना चाहता हूं। पमदीप जी ख़ुद शायर भी हैं और साहित्य के संवेदनशील पाठक भी। आप उस नॉवेल के बारे में क्या सोचते हैं?

पमदीप: प्रो. केवल कलोटी के नॉवेल में मनुष्य की जो शक्ति है, जो अदृश्य शक्ति है, शक्तिशाली देशों का उस शक्ति को अपने लिए इस्तेमाल किए जाना इस नॉवेल का केंद्रीय थीम है। यहां वह पैरासाइकॉलोजी को आधार बनाते हैं। लेखक ने पैरासाइकॉलोजी पर बहुत रिसर्च भी की। यह हमारे पारंपरिक रिद्धियों-सिद्धियों की तरह ही है। मगर इसका आधार विज्ञान है। मूल रूप में लेखक यह ही दर्शाना चाहते हैं कि किस तरह मनुष्य शक्तिशाली के हाथ की कठपुतली होता है। पावरफुल लोग संसार पर अपनी गिरफ्त बना लेते हैं और मनुष्य का शोषण करते हैं।

मदनवीरा: यहां मैं एक बात और कहना चाहता हूं कि हमारे वरिष्ठ लेखक सुखवीर का नॉवेल था ‘रात दा चेहरा’। उस नॉवेल में लेखक की जो छटपटाहट थी, उस छटपटाहट और नए दौर के नए सवालों को अब ‘अंतहीण’ में बड़ी शिद्दत से पेश किया गया है। हिंदी नॉवेल ‘गिलीगुडु’ में भी पूंजीवाद का शिकार मानसिकता और बेगानगी के अहसास को चित्रा मुदगिल ने अपनी सशक्त शैली में बयान किया है। अब ऐसे नॉवेल पंजाबी में अनुवाद करके प्रकाशित करना साहित्य के प्रति गंभीर सोच की गवाही है। कहानी के क्षेत्र में जो नए चेहरे आए हैं, उनमें अगर सांवल धामी की कहानी ‘मलहम’ और मनिंदर सिंह कांग की कहानी ‘भार’ अगर चर्चा में है, तो हमें इन कहानियों के सरोकारों को समझना होगा।

काली: अनेमन सिंह तुम ख़ुद अच्छे कहानीकार हो और तुम्हारा पहला कहानी संग्रह ‘गली नंबर कोई नहीं’ काफी चर्चा में है। इस समाज और साहित्य के बारे तुम किस तरह सोचते हो?

अनेमन सिंह: आज का समाज बहुत पेचीदा है। रसहीन है। मनुष्य मानसिक तौर पर बहुत उलझा हुआ है। कई बार तो आदमी आत्महत्या तक की बात सोच जाता है। समाज में ऐसे हालात आप देख भी रहे हैं और संवेदनशील होने के नाते महसूस भी कर रहे हैं। आज की कहानी इसीलिए •यादा पेचीदा है और रसहीन भी। आज का वृतांत उस तरह से लकीरी वृतांत नहीं है। समस्याओं का कोई अंत नहीं, कोई सुझाव भी नहीं है, सब कुछ दिशाहीन नज़र आता है। इसलिए कहानी में भी इसी तरह की उलझनें और मानसिक तौर पर अकेले, टूटे हुए पात्र आपको दिखाई देते हैं।

पमदीप: मुझे लगता है कि मनुष्य फिर से अपने स्वयं को खोजने लगा है। अब भी उसके सामने जंगल की स्थिति ही है। पहले मनुष्य जंगल में था, तो अपने अस्तित्व को ढूंढता था। उस समय का साहित्य इस बात की गवाही है। अब सिस्टम का जंगल है और मनुष्य फिर अपने अस्तित्व को खोज रहा है। शायद इसीलिए बहुत सारी कविता आपको अध्यात्मिक अनुभव की नज़र आएगी।

काली:इसके साथ ही मैं एक बात कहनी चाहता हूं कि हमारी कविता लोक-नायक की तलाश में भी नज़र आती है। इस दौर में हमारे कवि लोक-नायकों की पुन: सृजना कर रहे हैं। वे सिस्टम को समझना चाहते हैं और इसे बदलना चाहते हैं। मगर आज के मनुष्य में उन्हें नायकत्व का तत्व दिखाई नहीं देता। मदन तुम कुछ कहना चाहोगे?

मदनवीरा: हम आज ही कुछ दोस्त दूरदर्शन पर कविताएं पेश करके आए हैं। उन कविताओं में सबसे •यादा संत संधु की कविताओं की सराहना हुई है। बड़े मज़े की बात है कि आपके विचार की तरह ही इन कविताओं में एक ऐसी कविता थी, जिसमें संत संधु ‘दुल्ला भट्टी’ जैसे ऐतिहासिक नायक को अपना नायक मानता है और उसका न होना उसे खलता है। इसी तरह मोहब्बत के बाज़ार में बिक जाने की चिंता संत संधु की है और यहां वह ‘सोहिणी’ को याद करता है। इन नायकों की पुन: सृजना बहुत सारे नए सवालों को जन्म देती है।

अनेमन सिंह: जो बात पमदीप अध्यात्म वाली कर रहा था, मैं उसे स्वयं की तलाश की जगह भ्रम की चेतना मानता हूं। मनुष्य अध्यात्म का सहारा लेकर कुछ देर के लिए भ्रम में जीना चाहता है और बहुत हैरानी की बात है कि पंजाबी में और हिंदी में भी ऐसी बहुत सारी कविताएं आ रही हैं, जो अध्यात्मिक हैं। पंजाबी के पिछले समय में आए काव्य-संग्रहों के अगर टाइटल ही देखे, तो ‘कमंडल’, ‘तसबी’, ‘बरसे मेघ सखी’ इस तरह के अध्यात्मिक रंग वाले ही हैं।





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