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अक्षय बनेंगे तांत्या टोपे!

परदे के पीछेस्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामचंद्र पांडुरंग (1814-1859) जिन्हें तांत्या टोपे के नाम से जाना जाता है, के जीवन पर आधारित फिल्म भारत सरकार, निर्माता फिरोज नाडियाडवाला के साथ बराबरी की भागीदारी के आधार पर बनाना चाहती है। इस फिल्म के केंद्रीय किरदार के लिए अक्षय कुमार के नाम पर विचार किया जा रहा है।

पचास करोड़ रु. लागत की यह प्रस्तावित फिल्म पहले निर्माता कुमार मंगत और अनिल कपूर को बनाने के लिए दी गई थी, परंतु उन्होंने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। ‘गॉडमदर’ के लिए प्रसिद्ध विनय शुक्ला इस फिल्म का निर्देशन करेंगे। सारी शर्ते तय हो चुकी है, परंतु केंद्रीय सूचना एंव प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने अभी तक करारनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

निर्माताओं की असली समस्या यह है कि अक्षय कुमार ने अभी तक भूमिका स्वीकार नहीं की है। आजकल अक्षय कुमार मोटी रकम के साथ 25 प्रतिशत भागीदारी लेकर काम करते हैं और सरकार के सहनिर्माता होने के कारण उन्हें इसका लाभांश मिलना मुश्किल लग रहा होगा। इतिहास आधारित फिल्म में युद्ध और राजमहलों के भव्य महंगे सेट्स के कारण 50 करोड़ में फिल्म नहीं बन सकती, क्योंकि मुख्य सितारा ही 25 से 40 करोड़ का मेहनताना और लाभांश मांगता है। कुछ कलाकार फिल्म के स्वामित्व अधिकार में अपना प्रतिशत 99 वर्षो के लिए मांगते हैं।

ज्ञातव्य है कि आशुतोष गोवारीकर और यूटीवी मिलकर ‘जोधा अकबर’ 40 करोड़ में इसलिए बना पाए, क्योंकि रितिक को दो या ढाई वर्ष पूर्व अनुबंधित किया गया था, जब मेहनताना और लाभांश की बातें नहीं की जाती थीं। नाडियाडवाला किसी नए कलाकार के साथ तंत्रता संग्राम सेनानी रामचंद्र पांडुरंग (1814-1859) जिन्हें तांत्या टोपे नहीं बनाना चाहेंगे, क्योंकि लागत वापस नहीं आ सकती। भारतीय सिनेमा की मल्टीप्लेक्स आर्थिक संरचना सितारा केंद्रित हो चुकी है और ऐसे में सार्थक फिल्म रचना कठिन हो गया है।

सरकार को फिल्म निर्माण में नहीं आना चाहिए, क्योंकि मजबूत क्षेत्रवाद के जमाने में कोई भी व्यावसायिक हुल्लड़बाज यह सवाल उठा सकता है कि तात्या टोपे ही क्यों? महारानी लक्ष्मीबाई या बहादुरशाह जफर क्यों नहीं? सभी सरकारों को कला के क्षेत्र से दूर रहना चाहिए। वे प्रशासन और कानून व्यवस्था तक स्थापित नहीं कर पाते, फिर नए क्षेत्रों में जाने की क्या जरूरत है? सरकारें इतिहास आधारित फिल्मों का सर्वत्र प्रदर्शन तक कराने में अक्षम हैं, फिर निर्माण क्यों कर रही हैं। भारत में आम आदमी के सहज जीवन से जुड़ी समस्याओं के निराकरण में ही सरकार की रुचि होना चाहिए।

‘गांधी’ नामक फिल्म में राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम सर रिचर्ड एटनबरो का भागीदार था, परंतु क्या उन्होंने अपनी लागत के अनुरूप लाभांश प्राप्त किया था? आज उस फिल्म पर किसका स्वामित्व अधिकार है? फिल्म निर्माण सरकार का काम नहीं है। उन्हें सामाजिक समस्याओं पर वृत्तचित्र बनाना चाहिए। किसी भी देश की सरकार फिल्म निर्माण नहीं करती। यहां कम्युनिस्ट सरकारों की बात नहीं की जा रही है। बहरहाल चिंतनीय बात यह है कि कोई भी सुपरसितारा अपना लाभांश और लोभ छोड़कर राष्ट्रहित की फिल्म में काम नहीं करता।





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