आलेख.
अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों के लिए शेष दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार अत्यावश्यक है। यह कोई नई बात नहीं है बल्कि इसकी आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है। विशेषकर मुसलमानों की शैक्षणिक व सामाजिक दशा सुधारने के घोषित उद्देश्य से जितने कदम उठाए गए हैं, उन पर नजर डालने से ही यह साफ हो जाता है कि योजनाओं के बनाए जाने एवं उसके क्रियान्यवन के बीच बड़ी खाई होती है।
न्यायमूर्ति राजेंद्र सच्चर ने अपनी रिपोर्ट में मुसलमानों की शैक्षणिक एवं सामाजिक जीवन की जो तस्वीर पेश की है, उसमें 2001 की जनगणना रिपोर्ट को आधार बनाया गया है। उसके अनुसार केवल पांच प्रतिशत मुस्लिम युवा ही स्नातक कर पाते हैं। शहरी क्षेत्रों में स्नातक करने वाले मुसलमान युवकों का प्रतिशत 12 तथा युवतियों का 6 है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 5 प्रतिशत युवक एवं केवल एक प्रतिशत युवती ही स्नातक की पढ़ाई पूरी करते हैं।
10वीं की परीक्षा देने वालों में इनका अनुपात केवल चार प्रतिशत एवं 12वीं में तीन प्रतिशत है। अल्पसंख्यकों के दूसरे समुदायों में यह प्रतिशत ज्यादा है। कुल स्नातक लड़कियों में मुस्लिम लड़कियों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम है। यदि देश में अल्पसंख्यकों की आबादी 14 प्रतिशत के आसपास है तो शिक्षा के हर स्तर में इनका इतना अंशदान होना चाहिए।
केंद्र सरकार ने इस दिशा में अनेक कदम उठाए हैं, जिनकी आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी। पिछले 31 जनवरी को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यालयी छात्रों के लिए 1800 करोड़ रुपए की छात्रवृत्ति योजना की शुरूआत की।
इसके अलावा समिति ने देश के अल्पसंख्यक केंद्रित ऐसे 90 जिलों को चिन्हित किया जहां शिक्षा एवं सामाजिक विकास संबंधी मूलभूत संरचनाओं का विशेष अभियान के तहत विकास किया जाएगा। ऐसे और कुछ कदमों का उल्लेख किया जा सकता है किंतु मूल बात तो जमीनी हकीकत की है।
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एमएसए सिद्दीकी ने हाल ही में अल्पसंख्यकों विशेषकर मुसलमानों की शैक्षणिक स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि मुसलमानों के लिए शिक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार समय की मांग हैं।
सच्चर समिति के आंकड़ों के हिसाब से किसी भी देश के लिए शिक्षा क्षेत्र में इतना असंतुलन सामाजिक विकास की गति के रास्ते का रोड़ा ही माना जाएगा। सिद्धांतत: अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक में समाज को बांटकर देखना स्वस्थ समाज की निशानी नहीं है, लेकिन अतिवाद से परे होकर विचार करने पर कोई भी इस विचार को स्वीकारेगा कि अल्पसंख्यकों की दयनीय अशिक्षा न केवल उनके लिए, बल्कि देश की अनेक सामाजिक, आर्थिक समस्याओं का कारण है।
सरकार ने हाल में अनेक कदम अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक पुनरुत्थान के लिए उठाए हैं जैसे- अल्पसंख्यक शिक्षा के विकास के लिए बनी समिति ने मदरसों के आधुनिकीकरण एवं उर्दू भाषा के शिक्षकों की नियुक्ति के लिए राज्यों को विशेष धन प्रदान करने की जो सिफारिश की उसे भी सरकार ने स्वीकार कर लिया। लेकिन हम जानते हैं कि योजनाओं के बनाए जाने एवं उसके क्रियान्वयन के बीच बड़ी खाई होती है।
उदाहरण के लिए 2007-08 के प्रोफेशनल एवं तकनीकी शिक्षा के लिए केवल 5588 अल्पसंख्यक छात्रों को योग्यता सह गरीबी संबंधी छात्रवृत्ति प्राप्त हुई, जबकि निर्धारित संख्या 20 हजार है। इसमें मुसलमानों के लिए निर्धारित संख्या थी 14,585, लेकिन केवल 4344 ही ले पाए। इसके अलावा 2540 सिख छात्रों की जगह केवल 50 एवं निर्धारित 840 बौद्ध छात्रों की जगह केवल पांच को ही छात्रवृत्ति दी जा सकी। यदि धरातल पर योजना पूरी तरह साकार नहीं होगी तो इसका उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा।
यह स्थिति केवल एक योजना की नहीं है। यह तथ्य भी बिलकुल सही है कि अल्पसंख्यकों एवं मुसलमानों की आवाज उठाने वाली कांग्रेस के राज में ही उनकी स्थिति में गिरावट आई। हाल के कदमों के पीछे भी शायद खिसक चुके अपने परंपरागत मुसलमान व अल्पसंख्यक वोट को आकर्षित करने का उद्देश्य हो। किंतु हम जानते हैं कि भारत में अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों की सामाजिक मजहबी स्थिति एवं परंपरागत सोच उनके शैक्षणिक, सामाजिक विकास में मुख्य बाधाएं हैं। इसे दूर करना होगा।
केवल सरकार द्वारा धन के आवंटन, संस्थान खोलने या संस्थानों को हर प्रकार की सहायता व आजादी देने आदि से ये बाधाएं दूर नहीं होंगी। जब सुविधा उठाने वाले ही नहीं होंगे तो उनका अर्थ क्या होगा? इसके लिए व्यापक समाज सुधार अभियान की आवश्यकता है।
लेखक पत्रकार एवं राजनैतिक विश्लेषक हैं।