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एक नई शुरुआत के संकेत

दृष्टिकोण. relation अक्सर कूटनीति में शब्दों की तरह संकेत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बांग्लादेश ने भी ऐसे ही एक संकेत को चुना है, जोकि भारत के साथ संबंधों को प्रगाढ़ बनाने में मददगार साबित हो सकता है। अपनी स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग चार दशक बाद ढाका ने भारतीय सेना के उन सैनिकों और अधिकारियों को सम्मानित करने का निर्णय किया, जिन्होंने 1971 के उसके मुक्ति संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इस क्रम में उस समय भारतीय सेना के पूर्वी कमान के प्रमुख रहे जेएफआर जैकब समेत उनके अवकाश प्राप्त कई पूर्व सहयोगी अधिकारियों को बांग्लादेश ने अपने राष्ट्रीय दिवस पर सम्मानित किया। इस तरह बांग्लादेश ने स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरने में सहायक भारतीय सेना की भूमिका को सार्वजनिक रूप से सराह कर परस्पर द्विपक्षीय संबंधों के एक नये दौर की शुरुआत का संकेत दिया है।

हालांकि बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीब-उर-रहमान के समय से ही बांग्लादेश अपने मुक्ति संघर्ष में भारत द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार कर उसका आभार मानता चला आ रहा है। पर यह पहला प्रयास है जब भारत के सैन्य अधिकारियों को सम्मानित करने के लिए उन्हें ढाका बुलाया गया। यह पहल बांग्लादेश के सैन्य प्रमुख जनरल मोइन-यू अहमद की ओर से की गई।

बांग्लादेश की सेना अब ढाका में फखरुद्दीन अहमद की कार्यवाहक सरकार को समर्थन प्रदान कर रही है। जनरल अहमद की इस पहल को कुछ लोग राजनीतिक तो कुछ नैतिक दृष्टि से भी एक सही कदम मान रहे हैं। बांग्लादेश के मुक्ति संघर्ष में भारत ने जो सहयोग और समर्थन दिया था, उसकी यादें अब धुंधली पड़ चुकी हैं।

वर्तमान जनसंख्या के 50 प्रतिशत से अधिक लोग स्वतंत्रता के बाद पैदा हुए हैं, जोकि भारत को अपने मुक्तिदाता के रूप से कहीं अधिक इस क्षेत्र के दबंग के रूप में याद करते हैं। संभव है कि इस कदम से भारत की छवि सही तरीके से पेश हो सके और गलतफहमियां दूर हो सकें।

बीते दशकों में सैन्य शासन के साथ-साथ लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार, दोनों ही के दौर में ढाका ने बड़ी सावधानी से के साथ ढके-छिपे स्तर पर भारत विरोधी संगठनों को न सिर्फ अस्तित्व में आने दिया बल्कि उन्हें पनपने भी दिया। पिछले कुछ सालों से नई दिल्ली इस प्रक्रिया को बांग्लादेश की चीन और विशेषकर पाकिस्तान के साथ बढ़ती नजदीकियों के तौर पर देखता आया है।

भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान के कई लोगों का मानना था कि ऐसा बांग्लादेश की सेना में पाकिस्तान समर्थक तत्वों की उपस्थिति के कारण हुआ। इस लिहाज से इस हालिया कदम से जनरल अहमद ने नई दिल्ली को यह संकेत देने की कोशिश की है कि ढाका का नया शासन तंत्र भारत के साथ अपने द्विपक्षीय संबंधों को एक नया मोड़ देने के लिए तैयार है।

वास्तविकता यह है कि जिन भारतीय सैन्य अधिकारियों को बांग्लादेश ने सम्मानित किया उन्होंने पाकिस्तानी सेना को युद्ध में नीचा दिखाने का काम किया था। इस लिहाज से यह इस बात का भी स्पष्ट संकेत है कि बांग्लादेश का सैन्य प्रतिष्ठान भारत से प्रगाढ़ समर्थन की अपेक्षा कर रहा है।

पिछले साल जब देश के आमचुनावों को स्थगित कर ढाका में सैन्य समर्थित कार्यवाहक सरकार अस्तित्व में आई तो इस कदम का बांग्लादेश के भीतर और बाहर जबरदस्त समर्थन किया गया। जिस प्रकार से भ्रष्ट राजनीतिज्ञ और अधिकारी देश को चला रहे थे, उससे वहां के लोग नाखुश थे। हालांकि एक वर्ष बाद ही ‘स्वच्छ प्रशासन’ की चमक की परतें उघड़ने लगी।

बढ़ती महंगाई को रोकने में नाकामी सैन्य समर्थित कार्यवाहक सरकार की लोकप्रियता में कमी का प्रमुख कारण बनी। इसके अलावा लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली और स्थगित चुनाव कराए जाने की मांग भी तेज हुई है। कई राजनीतिक दलों ने खाद्य पदार्थो और अन्य चीजों की बढ़ती कीमतों को लेकर सड़कों पर धरना-प्रदर्शन करने की चेतावनी भी दी है। बांग्लादेश क लिए यह एक चुनौती की तरह ही है।

इधर, पिछले कुछ माह में जनरल अहमद और उनके सहयोगी अपने तमाम प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय सरकार में शामिल विभिन्न राजनीतिज्ञों के बीच एका बनाए रखने में असफल रहे हैं। इसके अलावा उन्होंने देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों की सर्वेसर्वा अवामी लीग की शेख हसीना और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की खालिदा जिया से पीछा छुड़ाने का प्रयास भी किया।

वर्तमान में ये दोनों नेत्रियां जेल में हैं, लेकिन दोनों में से किसी ने भी राजनीति से संन्यास लेने की कोई इच्छा नहीं दिखाई है। बीएनपी में तो टूट भी हो चुकी है, लेकिन आवामी लीग के अन्य नेता शेख हसीना के साथ डट कर खड़े हुए हैं।

हालांकि हसीना अब उपचार के लिए अमेरिका जाना चाहती हैं और ढाका में वर्तमान शासन के बहुत से लोग इसे लीग के दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे लाने की संभावना के एक अच्छे अवसर के रूप में देख रहे हैं। पर वे तब तक ऐसा नहीं करेंगे जब तक उन्हें भारत जैसे शुभचिंतक देशों के समर्थन का आश्वासन न मिल जाए।

कुछ सप्ताह पहले जब बांग्लादेश के सैन्य प्रमुख भारत दौरे पर आए थे तो उन्होंने बांग्लादेश की संभावित स्थितियों के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के साथ विस्तारपूर्वक बातचीत की थी। इसके साथ ही उनकी रक्षा मंत्री ए.के.एंटोनी और भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ भी कई दौर की बातचीत हुई।

माना जाता है कि इस बातचीत का उद्देश्य दोनों देशों की सेनाओं के संबंधों पर ही केंद्रित था। यही नहीं ढाका में कार्यवाहक सरकार भारतीय हितों के खिलाफ काम कर रहे राजनीतिज्ञों और इस्लामिक कट्टरपंथियों के संगठनों के खिलाफ पहले ही कार्रवाई की शुरुआत कर चुकी है।

हालांकि अगर बांग्लादेश में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार सत्ता में आती है तो वह उन सैन्य अधिकारियों को दंडित करने की कार्रवाई शुरू कर सकती है जिन्होंने भारत विरोधी राजनीतिज्ञों और उनके समर्थकों को जेल भेजने की पहल की थी।

जनरल अहमद यही आश्वासन चाहते हैं कि अगर बांग्लादेश में चुनाव कराए जाते हैं तो चुनाव बाद बनने वाली सरकार बदले की भावना से काम नहीं करेगी। इस तरह के समझौते के क्रियान्वयन के संदर्भ में भी उन्हें भारत के सहयोग और समर्थन की जरूरत है।

लेखक राजनीतिक मामलों के विश्लेषक हैं।





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