संपादकीय. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री तथा वित्तमंत्री द्वारा लगातार चिंता व्यक्त किए जाने के बाद भी महंगाई कम होना तो दूर रुकने का नाम नहीं ले रही है। महंगाई की दर 6.68 हो गई जो पिछले तेरह महीनों में सर्वाधिक है। यह खबर आम आदमी के साथ ही आम आदमी की राजनीति करने वाले राजनीतिक दलों को बेचैन करने वाली है।
सत्ताधारी कांग्रेस आगामी लोकसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत का मंसूबा पाले हुए है जबकि भाजपा इस भरोसे पर चल रही है कि अगली सरकार उसकी ही बनेगी। इन दोनों के लिए यह महंगाई आम आदमी की मुश्किलों का नहीं उनकी राजनीति का सबब है। भाजपा महंगाई के लिए केंद्र को दोषी करार दे रही है तो कांग्रेस रियायतों का पिटारा खोलने में लगी हुई है। इन दोनों की चिंता बुनियादी रूप से चुनावी संभावनाएं व आशंकाएं ही हैं।
आम चुनावों में सामान्य तौर पर महंगाई निर्णायक मुद्दा नहीं रही है लेकिन इससे उपजी मतदाताओं की नाराजगी चुनाव परिणाम को अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित तो करती ही है। जहां तक आर्थिक नीतियों का प्रश्न है तो इस मामले में कांग्रेस व भाजपा में कोई अंतर नहीं है। दोनों ही दल आर्थिक उदारीकरण के सक्रिय पक्षधर रहे हैं। यह तो नहीं कहा जा सकता कि महंगाई उदारीकरण की ही देन है लेकिन सरकारों की आर्थिक नीतियों में कहीं कुछ कमियां तो है हीं जिससे महंगाई पर लगाम लगाने में वे सक्षम नहीं रही।
हमारी राजनीतिक व्यवस्था में महंगाई आम आदमी की संवेदना और पीड़ा का नहीं राजनीति करने का मुद्दा रही है और तब यह और महत्वपूर्ण हो जाता है कि आम चुनाव नजदीक हों। इसी साल आधा दर्जन राज्यों में विधानसभा के तथा इसके बाद लोकसभा के चुनाव होना है। यह अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि लोकसभा चुनाव समय पूर्व हो जाएं।
चुनाव का सामना केवल कांग्रेस को ही नहीं, बल्कि कुछ राज्यों में भाजपा को भी करना है। लिहाजा महंगाई के निहितार्थ दोनों के लिए भिन्न हो सकते हैं। जहां तक वामदलों का सवाल है तो उन्हें महंगाई से अधिक एटमी करार की चिंता है। जब तक महंगाई चुनाव का निर्णयक मुद्दा नहीं बनेगा, तब तक इस पर राजनीति ही होती रहेगी और निर्णायक मुद्दा बनाना देश के जागरूक मतदाताओं के हाथ में है।