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अजमेर की कव्वाली फैली दुनियाभर में

रायपुर. दुनियाभर में कव्वाली की धूम मचाने वाले शमीम अहमद और नईम अहमद अजमेरी का मानना है कि ख्वाजा गरीब नवाज अजमेर के आस्ताने से निकली कव्वाली अब सारे जगत में फैल गई है। इसमें आधुनिक वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल होना इसकी तरक्की का प्रतीक है। दरबार से स्टेज तक के लंबे सफर के बाद भी इसका क्रेज कायम है और इसे सुनने वाले बढ़े हैं।

सूबे के दौरे पर शमीम-नईम अजमेरी यूं तो जयपुर के रहने वाले हैं पर उनके वालिद गुलाम अहमद अजमेरी ख्वाजा की दरगाह में दरबारी कव्वाल थे। बचपन से ही उन्होंने वालिद को गुरु बनाकर इस विरासत को संभाल लिया। 5 दशकों में उन्होंने देश-विदेश में खुदा का पैगाम सुनाया।

पहले हजरत जामीअलैह अहमद, हजरत रूमी, हजरत अमीर खुसरो, बेदम वारसी के कलामों में रुहानियत हुआ करती है। अब तो शायर वही लिखते हैं, जो अवाम को पसंद आता है। उन्होंने कहा कि कलाम वही है, जो ईश्वर से लौ लगाए। यह मामूली चीज नहीं है। इसे सही मायने में पढ़ने, समझने और सुनने वाला होना चाहिए।

फिल्म और पुरस्कार
अजमेरी भाइयों ने गंगा कसम, दीवाने मोहब्बत के, मैं मेरी पत्नी और वो, सांवली, गाफिल, अधर्म सहित कई फिल्मों में भी कव्वाली का रस घोला है। उनकी 50 सालों की सेवाओं और पूरे विश्व में राजस्थान का नाम मशहूर करने पर राज्य सरकार ने उन्हें 1976 में फक्रे राजस्थान और 2005 में राजस्थान गौरव सम्मान से नवाजा। वे बताते हैं कि विदेशों में उर्स के दौरान उनके प्रोगराम में हजारों लोग उमड़ते हैं। भले ही वे कव्वाली न समझें, पर ख्वाजा का नाम आते ही झूमने लगते हैं।

मुंह से बजाते हैं घुंघरु
अजमेरी बंधु एक अनोखी विधा के लिए भी जाने जाते हैं। वे मुंह से घुंघरू बजाते हैं। वे 35 साल पहले यह विधा इजाद करने वाले देश के पहले फनकार बने। हाफिज कानपुरी को वे गुरु मानते हैं। अब इस फन को और भी आर्टिस्ट पेश करने लगे हैं।

पूरे परिवार की टीम
अजमेरी बंधुओं की टीम में सारे आर्टिस्ट उनके परिवार के ही हैं। शमीम व नीम के अवाला दो और भाई फहीम और अलीम भी उनके साथ गाते हैं। वसीम, मुन्ना, फारुखी अजमेरी मुन्ना और नदीम वाद्ययंत्रों पर जलवे दिखाते हैं। ये सभी उनके बेटे या भतीजे हैं।

मुकाबले में रूहानियत खत्म
उनका मानना है कि लेडी कव्वालों के साथ स्टेज पर जंगी मुकाबले में कववाली की रूहानियत खत्म हो जाती है। तब यह सिर्फ मनोरंजन का साधन बन जाता है। हालांकि उन्होंने कहा कि अवाम की पसंद पर ही इसका आयोजन होता है। वे मानते हैं कि 40-45 सालों में लेडी कव्वालों ने भी काफी नाम कमाया। शकीला बानो भोपाली को उन्होंने पहली बार लेडी कव्वाल के रूप में सुना।

सरकार सुध ले कव्वालों की
अजमेरी बंधुओं का मानना है कि सरकार को देश के हजारों कव्वालों की सुध लेनी चाहिए। अपनी समस्याओं के लिए उन्होंने एसोसिएशन भी बनाए लेकिन सुनवाई नहीं हो सकी। कव्वालों की पूछ केवल ऊर्स के दौरान ही होती है।





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