ब्यावरा.
अपने बूते पर कुछ अलग करने की जिद ने 15 बीघा सूखी खेती के एक किसान को उद्योगपति बना दिया। ब्यावरा के हरिशंकर दांगी ने 20 साल पहले पांच किलो मैदा से ब्रेड बनाने की शुरुआत की थी और आज हर दिन तीन हजार किलो मैदा 50 प्रकार के बेकरी प्रॉडक्ट बनाने में खपती है। 12 जिलों में उनके बनाए उत्पादों की मांग है। यही नहीं, उनकी बेकरी में करीब डेढ़ सौ कर्मचारी काम करते हैं।
बात 1985 की है, जब वे मप्र कंसल्टेंसी ऑर्गनाइजेशन (एमपीकॉन) के एक उद्यमिता विकास कार्यक्रम में शरीक हुए। वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि यह कार्यक्रम उनके घर के पास ब्यावरा में ही आयोजित हुआ था। बी.काम. पास दांगी तब 33 साल के थे और करीब 30 प्रतिभागियों में उन्हें आर्थिक और अनुभव के आधार पर सबसे कमजोर माना गया। इसी कार्यक्रम के दौरान कच्चे माल की आपूर्ति के लिहाज से उन्हें बेकरी उत्पादों की निर्माण इकाई शुरू करने की सलाह मिली। लेकिन अगले तीन कठिन संघर्षपूर्ण सालों का अंदाजा उन्हें कतई नहीं था। महीनों पापड़ बेले-भूमि के डायवर्शन और विद्युत मंडल से कनेक्शन लेने में महीनों पापड़ बेलने पड़े और जब मप्र वित्त निगम के समक्ष दो लाख 30 हजार रुपए के ऋण का आवेदन लगा तो भोपाल के चक्करों और खर्च ने उन्हें पस्त कर दिया। निगम ने उनका आवेदन इस आधार पर रद्द कर दिया कि ब्यावरा में ब्रेड की कोई मांग नहीं है।
अंतत: एक दिन वे हताश होकर एमपी कॉन के प्रोजेक्ट आफिसर से जा भिड़े और गुस्से में अपनी बरबादी के लिए उन्हें कुसूरवार ठहरा आए। अधिकारियों ने उनके गरम तेवरों पर ठंडे दिमाग से विचार किया और अपने विशेषज्ञों के जरिए ब्यावरा में बेकरी उत्पादों की संभावनाओं पर सर्वेक्षण कराया। पता चला कि एबी रोड पर स्थित होने से कई होटलें वहां थीं, लेकिन ब्रेड भोपाल से आती थी। अत: संभावना तो थी। जैसे-तैसे दिसंबर 1986 में उनका ऋण मंजूर हुआ और हरियाणा में नीलोखेड़ी जाकर उन्होंने व्यवहारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया।
तब और अब- जब पहली बार 1988 में पंजाब से काफी विलंब से आई मशीनों के जरिए पांच किलो मेंदा की ब्रेड बनाई, तब बाजार में उन्हें पूछने वाला कोई न था। फिर वे बस्ती में घर-घर गए और ताजा ब्रेड की खूबियों की जानकारी लोगों को दी। कुछ लोगों ने उनकी ब्रेड को आजमाया, काम चल पड़ा, घरों से उठी मांग दुकानों तक गई तो बाजार में उनकी पूछ-परख शुरू हुई। नतीजा-इतनी जद्दोजहद के बाद वे ब्रेड के कुलजमा 12 पैकेट की मांग ब्यावरा में पैदा कर पाए..और आज अकेले ब्यावरा में ही 12 हजार रूपए रोज के उनके बेकरी उत्पादों की आपूर्ति होती है।
प्रशिक्षण के बाद दफ्तरों के चक्कर काट-काटकर मैं हताश हो चुका था। एक बेकरी से मुझे इसलिए निकाल बाहर किया गया, क्योंकि मैं कुछ सीखना चाहता था। लेकिन जिद थी कि काम तो यही करना है।
-हरिशंकर दांगी,संचालक, प्रभात ब्रेड इंडस्ट्रीज।
उस बैच में हमने हरिशंकर को सबसे कमजोर प्रतिभागी माना। लेकिन उन जैसी जबर्दस्त लगन भी किसी में नहीं थी। शायद इसीलिए हर कदम पर आई बाधा को उन्होंने पार किया। नतीजा सामने है।
-डा. गुरपालसिंह जरयाल,तत्कालीन प्रोजेक्ट आफिसर, एमपी कॉन।