दृष्टिकोण. केंद्र सरकार देशभर में 14 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय खोलने जा रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि इस घोषणा पर खुशियां मनाई जाएं या जार-जार रोया जाए। ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में इस मद के लिए 2,800 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। यह जानकारी होते ही वे राज्य सरकारें सक्रिय हो गई होंगी, जिनके राज्यों के नाम यह लॉटरी खुलने वाली है। जाहिर है कि साथ में ठेकेदार और व्यापारी भी बड़ी संख्या में जोड़-तोड़ में व्यस्त हो गए होंगे ताकि उनका हिस्सा कोई और न हथिया ले।
पूंजीपति और कारपोरेट घराने भी फिक्की, एसोचैम और सीआईआई पर दबाव जरूर बना रहे होंगे ताकि ये विश्वविद्यालय ‘सार्वजनिक-निजी सहभागिता’ यानी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप(पीपीपी) तंत्र में बनाए जाएं। वैसे पूंजीपतियों और कारपोरेट घरानों को ज्यादा कवायद नहीं करनी होगी, क्योंकि शिक्षा में पीपीपी तंत्र के सिद्धांत को व्यापक स्वीकृति मिल चुकी है। आखिरकार, शिक्षा को बाजार में खरीद-फरोख्त की वस्तु बनाने और शिक्षा को पीपीपी तंत्र में ढालने की जुड़वां नीति की अनुशंसा विश्व बैंक ने तो पहले ही कर दी है।
एक लिहाज से देखें तो पीपीपी तंत्र, सार्वजनिक संसाधनों पर निजी पूंजी का कब्जा स्थापित करने का जरिया है। पिछले वर्ष योजना आयोग की बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रधानमंत्री ने पीपीपी को भावी शिक्षा नीति का महामंत्र घोषित कर ही दिया था। राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में तमाम पार्टियों की विभिन्न राज्य सरकारों के मुख्यमंत्रियों ने भी 11वीं पंचवर्षीय योजना पर अपनी मोहर लगाकर विश्व बैंक के पीपीपी तंत्र को लोकतांत्रिक जामा पहना दिया है। रही-सही कसर राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने पूरी कर दी, जिसने मुट्ठी भर विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों की अनुशंसा भी की और पीपीपी तंत्र को भी सराहा।
दरअसल, एक तरफ ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने का सवाल है जिसका मकसद सभी वर्गो, जातियों, मजहबों और क्षेत्रों को बराबरी और न्याय पर टिकी हुई लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है ताकि पूरे अवाम का समतामूलक विकास हो सके। गुणवत्तापूर्ण उत्कृष्ट शिक्षा के नाम पर बराबरी, न्याय, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक सिद्धांतों को तो छोड़ा नहीं जा सकता। यूजीसी ने अक्टूबर 2007 की अपनी रपट में ठीक यही बात कहते हुए अनुशंसा की थी कि उत्कृष्टता के चंद टापू खड़े करने से देश का विकास नहीं होगा। इसकी बजाय हमें सभी कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों का गुणवत्तापूर्ण विकास करने का फैसला करना होगा।
दूसरी तरफ वैश्विक पूंजी और बाजार की तर्ज पर बनी नव उदारवादी नीति के अनुसार समाज के महज अभिजात व ऊपरी मध्यम वर्गो को ही गुणवत्तापूर्ण उत्कृष्ट शिक्षा देना पर्याप्त माना जाता है। शेष 85 फीसदी जनता को ‘घटिया’ शिक्षा देने से काम चल जाएगा। चूंकि उनका काम केवल कारखानों में निर्देशों पर उत्पादन करना होगा। ज्ञान सृजन का काम तो भारत के उच्चवर्गीय 15 फीसदी तबकों का रहेगा, जिसके लिए उन्हें ऊंचे वेतनमान दिए जाएंगे। यदि गरीबी, तिरस्कार और घटिया शिक्षा के बावजूद दलित, आदिवासी, अति पिछड़े और मुस्लिम समुदायों में से कोई बाजार की परिभाषा में ‘प्रतिभाशाली’ किशोर या युवा उभर आता है तो उसको तुरत-फुरत छात्रवृत्ति या शैक्षिक ऋण की सुविधा दी जाएगी, क्योंकि उसकी प्रतिभा का पूरा फायदा वैश्विक बाजार को ही उठाना है।
इसीलिए प्रधानमंत्री ने 11वीं पंचवर्षीय योजना में छह हजार उत्कृष्ट स्कूल, 14 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय और मुट्ठी भर एम्स, आईआईटी व आईआईएम खोलने का फैसला लिया है। इसका साफ मतलब है कि देश भर में लगभग 12 लाख स्कूलों, 400 विश्वविद्यालयों, 10,500 कॉलेजों और 2,200 मेडिकल व इंजीनियरिंग कॉलेजों को उनके वर्तमान हाल पर छोड़ दिया जाएगा। वैश्विक बाजार के लिए जितने ज्ञानकर्मियों की जरूरत है उतनी ही तादाद में उत्कृष्ट गुणवत्तावाली शैक्षिक सुविधा देने की नीति ठीक वही है, जो सन् 1835 में मैकाले ने अपनाई थी। फर्क सिर्फ इतना है कि मैकाले का उद्देश्य ईस्ट इंडिया कंपनी का कारोबार चलाने के लिए भारत की प्राकृतिक संपदा का शोषण करना था तो नव उदारवादी नीति पर चलने वाली भारत सरकार का मकसद वैश्विक बाजार के लिए कुशल ज्ञानकर्मियों की हुक्म की ताबेदार फौज खड़ी करना है, जो दुनिया भर के गरीब मुल्कों के संसाधनों को लूटकर वैश्विक पूंजी को मजबूत बनाने का काम करे।
तो फिर देशप्रेमी और जनपक्षी शैक्षिक विकल्प का क्या होगा? भारत के 6-18 आयु समूह के सभी तीस करोड़ बच्चों को उत्कृष्ट गुणवत्ता की समतामूलक एवं मुफ्त शिक्षा देने के लिए पड़ोसी स्कूल के सिद्धांत पर टिकी हुई 12वीं कक्षा तक की समान स्कूल प्रणाली खड़ी करना सर्वोच्च प्राथमिकता का काम है। इसके साथ ही 6 वर्ष से कम उम्र के 17 करोड़ बच्चों के लिए पोषण, सेहत और पूर्व प्राथमिक (नर्सरी) शिक्षा का पक्का इंतजाम करना होगा ताकि बच्चों का समुचित शारीरिक व मानसिक विकास हो-तभी तो वे शिक्षा का लाभ उठा पाएंगे। ऐसा करने पर ही सभी वर्गो और वर्णो के बच्चे 12वीं तक शिक्षा पाकर विश्वविद्यालय की शिक्षा के लिए तैयार होंगे। आज बमुश्किल 15 से 20 फीसदी बच्चे 12वीं से आगे निकल पाते हैं।
दलितों, आदिवासियों, अति पिछड़ों और मुस्लिमों में तो यह प्रतिशत महज 6 से 8 है। फिर हमें इतने कॉलेज, विश्वविद्यालय और तकनीकी शिक्षा संस्थान चाहिए कि सन् 2020 तक 18 से 23 आयु समूह के कम से कम 25 फीसदी युवा जनहित पर टिके सामाजिक विकास (न कि बाजार) की जरूरतों के अनुकूल उत्कृष्ट गुणवत्ता की शिक्षा पाने के हकदार बन जाएं। आज केवल 10 फीसदी युवा उच्च शिक्षा पाते हैं और वह भी अक्सर घटिया शिक्षा, जो बाजारीकरण की नीति के चलते बढ़ते क्रम में महंगी होती जा रही है।
अत: बात मुट्ठी भर उच्च शिक्षा संस्थानों के लॉलीपॉप की नहीं है, वरन् असली सवाल एक समतामूलक व उत्कृष्ट गुणवत्ता की स्कूली व उच्च शिक्षा व्यवस्था खड़ी करने का है। शिक्षा की इस समावेशी, समृद्ध और जनहित से प्रेरित उर्वर बुनियाद पर ही विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय पनप सकेंगे, न कि देश व समाज को बांटने वाली, घटिया और बाजार के मुनाफे से दिशाहीन हुई बहुपरती शिक्षा व्यवस्था की वर्तमान बंजर जमीन पर।