अजमेर. एक ओर मंच पर कैलाश खेर और उनके बैंड ‘कैलासा’ का जोश था तो दूसरी ओर बल्लियों से ऊंचा उठता शहर के युवाओं का शोर। खेर के जादू से संगीत प्रेमी खुद को बचा नहीं पाए। मौका था रविवार की रात आजाद पार्क में राजस्थान दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम का।
सूफी संगीत के लिए मशहूर कैलाश ने अजमेर के धार्मिक महत्व को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम की शुरुआत फिल्म ‘देव’ के ‘पिया के रंग, रंग दीन्ही ओढ़नी..’ गीत से की। इसके बाद अपने ग्रुप के पहले एलबम ‘प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी..’ को पेश कर अपने चाहने वालों का दिल जीत लिया। इसके बाद चले गानों के दौर ने संगीत प्रेमियों के तथाकथित मास और क्लास कहे जाने वाले वर्र्गो की दूरियां पाट दीं।
फिल्म मंगल पांडे, द राइजिंग के ‘मंगल-मंगल’ और राजस्थानी रंग लिए ‘जोवण झलक’ जैसे गीतों ने सभी उम्र के लोगों को झूमने पर मजबूर कर दिया। भोलेनाथ और पार्वती के वार्तालाप पर आधारित गीत ‘..बम लहरी’ की पेशकश पर माहौल फिर से बदला।
इसके बाद अपने कॅरिअर की शुरुआती सफलता ‘अल्लाह के बंदे’ को प्रस्तुत कर कैलाश ने शहरवासियों का मन जीत लिया। कार्यक्रम का अंत अपनी कव्वाली ‘दुनिया ऊट-पटांगा’ की ऊर्जापूर्ण प्रस्तुति के साथ किया।
‘हैवी डोज’ हजम करने का शुक्रिया
एलबम कैलासा के गीत ‘सइयां..’ ने माहौल को गंभीर बना दिया। इस गंभीरता को और बढ़ाया नुसरत फतेह अली खान के गीत ‘सानू इक पल चैन न आवे..’ ने। शहरवासियों ने इन बेहद गंभीर किस्म के गानों पर भी जोरदार रिस्पांस दिया। कैलाश ने सभी का ‘हैवी डोज’ पचाने के लिए शुक्रिया अदा किया।
कार्यक्रम के दौरान हर गीतों पर कैलाश और उनके साथियों का लोगों ने उत्साहवर्धन किया। पार्क में मौजूद शिक्षा राज्यमंत्री वासुदेव देवानानी, नगर परिषद सभापति धर्म्ेद्र गहलोत, अतिरिक्त कलेक्टर केके शर्मा व लालाराम गुगरवाल, एडीएम सिटी स्नेहलता पंवार, एसडीएम आशू चौधरी भी शहरवासियों के साथ-साथ झूम उठे।
..अखरा कलेक्टर का जाना
खेर को कलेक्टर नवीन महाजन का कार्यक्रम के बीच में से चले जाना अखर गया। उन्होंने कहा ‘कहां चले गए कलेक्टर साहब, चले गए, चलो अच्छा हुआ। मैं कल उनसे इस बारे में बात करूंगा।’ हालांकि खेर लगातार गीतों की प्रस्तुति देते रहे।
मगर कम भीड़ को देखकर उन्होंने व्यंग्यात्मक तरीके से कहा ‘वाह, क्या व्यवस्था है। दूर-दूर तक लोग बैठे हैं।’ जबकि हकीकत यह रही कि कार्यक्रम में बमुश्किल डेढ़ हजार लोग थे। इनमें भी कॉलेज स्टूडेंट्स ज्यादा थे। पीछे तक बैठने जगह खाली पड़ी थी। केवल प्रशासन के अफसर और वीआइपी ही बैठकर कार्यक्रम देख रहे थे।