बीकानेर. शीतला माता पर आस्था और विश्वास की डोर से बंधे सैकड़ों परिवारों में जहां रविवार को चूल्हा नहीं जला वहीं अधिकांश परिवारों में चाय तो बनी मगर माता का पूजन करने के बाद। पौ-फटते ही ठंडे पानी से स्नान कर, एक दिन पहले बनाए गए भोजन व पूजन-सामग्री से सजी थाली लिए महिलाएं शीतलागेट की ओर चल पड़ी। सुबह होते-होते यहां अच्छा-खास मेला भर गया और मंदिर में दर्शन के लिए कतार बनानी पड़ी।
माता की प्रतिमा पर जलाभिषेक, नमक आरोगण व बासी भोजन का प्रसाद चढ़ाने का क्रम शुरू हुआ जो धूप तीखी होने तक जारी रहा। माता के मंदिरों में गूंजते स्तुतियों के सुरों में वर्षर्पयत अपने बच्चे पर मेहरबानी बनाए रखने की अरदास ‘माता ऐ थारे टाबरियों पर मेहर सवाई राखे ऐ.’ जैसे अंदाज में हुई।
मंदिर में जलाभिषेक करने के साथ ही महिलाओं के जत्थे जहां आस-पास जगह देखकर कथा कहने-सुनने में जुट गए वहीं लक्ष्मीनाथ पार्क में भी कथा कहने-सुनने का दौर चलता रहा। मरुनायक मंदिर के आगे भी शीतलाष्टमी के मौके पर मेला भरा। इस मौके पर घरों में काले रंग की नई मटकियां भरकर उनकी पूजा भी की गई।
परकोटे के भीतरी शहर में जहां शीतला माता का पूजन करने लोग उमड़े वहीं बस्तियों, आस-पास के गांवों में माता के वाहन वैशाखनंदन (गधे) की पूजा हुई। गली-गुवाड़ में महिलाओं के जत्थों ने एकत्रित होकर वैशाखनंदन के सिर पर जलधार चढ़ाई, कुमकुम लगाया, अक्षत चिपकाए, ग्रास दिया और मौÝी बांधी। शहर के आस-पास की बस्तियों में यह पशु उपलब्ध नहीं होने से कई लोग वैशाखनंदन को लिए-लिए बस्तियों में घूमते भी नजर आए।
घर-घर छाछ-राबड़ी
शीतलाष्टमी के दिन ठंडा (बासी) खाना खाने के रिवाज के चलते रविवार को शहर के अधिकांश घरों में एक दिन पहले बना भोजन ही थाली में परोसा और इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया गया।
थाली के इस मीनू में बड़कबाटी, बेडवी, बाजरी की पूड़ी, कैर-सांगरी, ग्वारपाठा की सब्जी, छाछ के साथ राबड़ी जैसे आइटम मुख्य रूप से थे वहीं पेय में खासतौर पर कांजी भी बनाई गई। मान्यता के मुताबिक शीतला माता दाद, खाज-खुजली, कोढ़ जैसी बीमारियों से रक्षा करती है। इसके लिए बासी भोजन चढ़ाकर उसी का सेवन किया जाता है।