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विलुप्तप्राय होमोसैपियन

मूर्ख दिवस पर हास-परिहास विशेष. बंदर की लाखों पीढ़ियों के बाद एक जानवर का विकास हुआ। वैज्ञानिकों ने इसे होमोसैपियन नाम दिया। हमने इसे मनुष्य, आदमी, इंसान आदि नामों से जाना। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी रीढ़ थी। यह अपने पूर्वजों के विपरीत तनकर खड़ा हो सकता था। इसके अंदर भला-बुरा सोचने की शक्ति का विकास हो गया था। यह समाज में रहना सीख गया था। यह इकलौता प्राणी था जो मुस्कुरा सकता था। बड़ा अच्छा प्राणी था।

ज्ञानियों का विचार है कि प्राणी में जिस अंग का प्रयोग होना बंद हो जाता है, वह अंग कालांतर में विलुप्त हो जाता है। आदमी के शरीर में अपेंडिक्स नामक अंग बस खत्म होने की कगार पर है। इस अंग का मानव शरीर में कोई उपयोग नहीं है। कभी-कभी दर्द देने के लिए यह अंग सक्रिय होता है। आदमी के कान भी इसी श्रेणी में आते हैं। यह तो कहो कि कुछ स्कूलों में मास्टर लोग अभी तक इस अंग को खींचकर या उमेठकर इसकी उपयोगिता बरकरार रखे हुए हैं, वरना यह अंग भी जाने कब का समाप्त हो गया होता। पहले हो सकता है कि आदमी के गाय-भैंस जैसे लंबे कान मक्खियां उड़ाने के काम आते हों, पर अब चश्मा टिकाने के अलावा इनका और कोई काम नहीं है।

समय बीता। इसका और विकास हुआ। इसने तनकर खड़े होने के नतीजे देख लिए, इसलिए इसने झुकने की कला सीख ली। यह इतना झुका कि इसकी रीढ़ विलुप्तप्राय हो गई। अब इसके पास रीढ़ दिखाई नहीं पड़ती है। यदि रीढ़ है भी तो अत्यधिक लचीली। कम प्रयोग में आने के कारण इसकी मजबूती में कमी आई है। कुछ समय पहले तक वह मौके के अनुसार रीढ़ को तान लेता था। अब तो ऐसे मौके मुश्किल से ही आते हैं। अब तनी हुई रीढ़ इसकी विशेषता नहीं रही। कई बार किसी के पास रीढ़ भी है, यह तब पता चलता है जब वह स्लिप डिस्क के कारण बिस्तर पर पड़ा होता है।

रीढ़ का विकास के साथ सीधा संबंध है, जो जितना विकसित उसमें रीढ़ की उतनी ही कमी। इसे ऐसे भी कह सकते हैं कि जिसमें रीढ़ जितनी कम होती है वह उतनी ही शीघ्रता से विकास करता है। उन्नति करता है अर्थात रीढ़ विकास में बाधक है, इसलिए विलुप्तप्राय है। वैसे रीढ़ भी अपेंडिक्स की तरह कष्ट देने भर को ही बची है। रीढ़ वालों की रीढ़ तोड़ना बिना रीढ़ वालों का प्रिय शगल है, इसलिए रीढ़ और भी खतरे में है।

रीढ़ के साथ-साथ होमोसैपियन में आत्मा नामक चीज का भी विकास हुआ था। इसे अंतरात्मा भी कहते हैं। आज रीढ़ के साथ यह भी खतरे में है क्योंकि अंतरात्मा आवाज बहुत करती है, इससे बिना अंतरात्मा वाले डिस्टर्ब हो जाते हैं। उनकी सहूलियत के लिए अंतरात्माएं या तो दबा दी जाती हैं या फिर चिरनिद्रा में सुला दी जाती हैं। समय के साथ होमोसैपियन मुस्कुराना भी भूल चुका है। सामान्य होमोसैपियन तो कभी-कभी मौका पाकर मुस्कुरा भी लेता है, पर ऊंचाई पर पहुंच चुका होमोसैपियन हंसना छोड़ चुका है।

वह अपने से नीचे वालों के सामने अपनी मुस्कुराहट बरबाद करना नहीं चाहता और अपने से ऊपर वालों के सामने मुस्करा नहीं पाता है। बस अपने आदि पूर्वजों की भांति दांत दिखा सकता है। वह हंसने के लिए मार्निग वॉक के बाद लाफ्टर क्लब जाता है। हा हा हा करता है। हंस नहीं पाता है। यह रीढ़ और अंतरात्मा वाला होमोसैपियन जो हंस सकता है, यदि कहीं मिले तो उसे मेरा भी सलाम कहना।





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