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जल बना जी का जंजाल

मूर्ख दिवस पर हास-परिहास विशेष. कल से नल नहीं आ रहा। टोटी का मुंह सूखा हुआ है। टंकी खाली है। बाल्टियां औंधी पड़ी हैं। सपरिवार परेशान हूं। बमुश्किल तमाम सड़क के पब्लिक हैंडपंप से तीन-चौथाई बाल्टी जल उपलब्ध हो पाया है। वह भी एक घंटा लाइन में अपनी टिटिहरी टांगें तोड़ने के बाद नसीब हुआ। सर्वत्र पानी की मारामारी है। मैं दो बाल्टियां लेकर गया था। दूसरी भरने की न हिम्मत शेष बची थी, न ही हौसला। उधर, अड़ौसी-पड़ौसी सब के सब हैंडपंप पर युद्धमुद्रा में खड़े हैं। अपना संपूर्ण मोहल्ला बुंदेलखंड हो रहा है।

जल संसाधन विभाग वालों से शिकायत की। वे कहते हैं ‘हम तो पानी की सप्लाई बराबर दे रहे हैं। आपके एरिया में नहीं पहुंच पा रही है, आश्चर्य है। मगर आप पानी जैसी अदना चीज के लिए झूठ तो बोलेंगे नहीं, इसलिए विश्वास कर लेते हैं कि वॉटर सप्लाई उधर नहीं आ रही होगी। संभव है, पाइप लाइन बीच में ही कहीं से फट गई हो और लीकेज हो रही हो। चेक कराना होगा। कल करा देंगे। हाल-फिलहाल काम चला लीजिए। कोई शॉप हो तो वहां से पांच-दस मिनरल वॉटर की बोतलें मंगवा लीजिए या फिर आसपास कोई कुआं तो होगा ही।’ जी में आया कह दूं: कुआं तो है मगर वह सूखा हुआ है अन्यथा मैं अब तक उसमें कूद ही चुका होता। फिर भी तसल्ली के लिए पूछ ही लिया, ‘आपके यहां इमरजेंसी सप्लाई के लिए पानी के टैंकर्स भी तो हुआ करते थे।’

वे कहने लगे, ‘हुआ नहीं करते थे, अब भी हैं। फुल हैं। मगर वीआईपी ड्यूटी के चलते रोड पर छिड़काव कर रहे हैं। आप मतलब समझिए। अभी आदमियों की शॉर्टेज है। अपना गैंग दूसरी साइट पर है। उसके आते ही हम फौरन भिजवा देंगे।’

मैंने छेड़ा, ‘सरकार तो कहती है कि हर सरकारी विभाग में जरूरत से ज्यादा कर्मचारी भर्ती हैं और आप कह रहे हैं कि शॉर्टेज है।’ वे सरकारी तरीके से मुस्कुरा उठे। ‘हमने कब कहा, कार्मिकों की कमी है। कर्मचारी तो ढेर सारे हैं, तो क्या वे सड़क पर जाकर गड्ढे खोदेंगे। वे सरकारी सेवक हैं। आपको पता होना चाहिए कि सरकारी काम हमेशा सरकारी तरीके से ही होता है। किसी को पानी पर चढ़ा देने मात्र से हम रात-बिरात कीचड़ में घुस जाने की बेवकूफी नहीं कर सकते। आखिरकार हमारे भी बाल-बच्चे हैं।’

मैं इस जवाब से पानी-पानी हो जाता हूं। अपने निजी बाल-बच्चों के बिना धुले मुखड़ों को देखता हुआ सोचने लगता हूं, व्यवस्था को क्या दोष दूं? उसकी खुद की, अगर कोई नाक होती होगी, तो उसमें भी उसके भीतर के लोग ही दम किए रहते हैं। नदियों को प्रदूषण से अधिक खतरे अब मेंढकों, मगरमच्छों और घड़ियालों से होने लग गए हैं। अब मैं पानी को लेकर किसके आगे अपना रोना रोऊं! राजनीति का पानी कब का मर चुका है।

अफसरों की आंखों का पानी नदारद है। महंगाई की चोट से रो-रोकर आम जनता के नयनों का अश्रु जल सूख चुका है। सुविधा के बादलों को जहां पर बरसना चाहिए था, वे आजादी के बाद से ही वहां पर नहीं बरसे। वे भी कुछेक वीआईपी हलकों को ही तर करते रहे हैं। मुझे रह-रहकर दुष्यंत कुमार याद आ रहे हैं, ‘यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।’





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