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इंस्टेंट यानी तुरत-फुरत का बोलबाला

विकास मंत्र. लोगों के पास ज्यादा वक्त नहीं है। यह तुरत-फुरत का युग है। शहरों में उपभोक्ताओं की एक पूरी पीढ़ी की समयहीनता की जरूरत को पूरा करने के लिए नया रुझान दिखाई देता है। इसे इंस्टेंट मूवमेंट कह सकते हैं। इस किस्म के उत्पादों की आदिकालीन प्रतिनिधि इंस्टेंट कॉफी थी, जो 35 साल पहले बाजार में आई। यह तेज गति की कॉफी थी। बनाने में कम समय लेने वाली कॉफी। अड़चनों से मुक्त कॉफी। मगर आज उपभोक्ताओं की नई उतावली पीढ़ी के लिए इंस्टेंट फूड और पेय पदार्थो की बहार आ गई है। इनकी खासियत है तेज रफ्तार, निरंतरता, बनाने में आसान और जुबान पर निराला स्वाद।

महानगर की किसी किराना दुकान पर निगाह डालिए। बूढ़ी गंगा मां की गैरेजनुमा दुकान के कोने में एक फ्रिज रखा है और उसमें रखा है तरल अवस्था में बना-बनाया इडली-मिक्स। इस्तेमाल के लिए तैयार। न चावल, न दाल मिलाने की झंझट, न बीनना, न चुनना, न भिगोना, न सुखाना, न पीसना। सब कुछ किया जा चुका है। बस इडली बनाइए और खाइए। यह किसी भी दूसरी इडली का ही स्वाद देगी। इसे किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी ने नहीं, एक स्थानीय दूरदर्शी उद्यमी ने बनाया है। आज के इंस्टेंट उत्पाद ज्यादा संपूर्ण हैं, इसीलिए उपभोक्ताओं को पसंद आते हैं और मुंह जुबानी उनका प्रचार होता है।

बेंगलुरू में एक फर्म ने 29 मिनट में इंस्टेंट कार सर्विस की पेशकश की। कार की सर्विस के लिए पूरा दिन बर्बाद करने से आजिज आ चुके लोग ऐसी पेशकश की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। पुराने लोग कह सकते हैं कि कुछ चीजें पूरा समय लगाकर करने पर ही अच्छी होती हैं। लेकिन इंस्टेंट और नॉट-सो-इंस्टेंट के बीच दिलचस्प लड़ाई छिड़ चुकी है। तो पहले इडली थी। फिर इडली-मिक्स आया। और अब तरल रूप में इडली-मिक्स आ चुका है। आगे क्या? इंस्टेंट का कोई छोर है या नहीं?

-लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं।





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