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पहनावे को अपनी रुचि का प्रतीक बनने दें

मैं एक इलेक्ट्रॉनिक स्टोर के बाहर बैठी हुई थी। यह स्टोर सुंदर तरीके से तैयार किया गया था और पूर्णतया वातानुकूलित भी था, पर बाहर चल रही अच्छी हवा और ठंड के कारण मैं वहीं बैठ गई। स्टोर के भीतर तब तक परिवार के अन्य सदस्य टीवी खरीदने की औपचारिकताएं पूरी कर रहे थे। मैं यूं ही स्टोर में आने-जाने वालों को देख रही थी। उन्हें देखते-देखते अचानक मुझे अहसास हुआ कि स्टोर में आने वाले युवा वर्ग का पहनावा लगभग एक जैसा ही था।

युवा लड़के अधिकांशत: जींस-पैंट और लड़कियां कुत्र्ता-टॉप या इक्का-दुक्का सलवार कमीज पहने नजर आईं। आने वाले अधिकतर जोड़े थे, जिनमें से कुछ के साथ उनके बच्चे भी थे। कई लोग कारों से आ रहे थे, तो वहीं कुछ पास में घर होने की वजह से पैदल भी आ रहे थे।

दूसरे दिन मैं फिर एक मॉल में आइसक्रीम खाते हुए अपने पसंदीदा टाइमपास यानी लोगों को आते-जाते देखने का लुत्फ उठा रही थी। वहां भी आते-जाते लोगों को देखते हुए मुझे कुछ-कुछ उसी तरह का आभास हुआ। मुझे लगा कि युवा वर्ग, यहां तक कि जिन्हें फैशन का कखग भी नहीं मालूम, अधिकतर पाश्चात्य पहनावे में था। कई जगहों से कटी-फटी और बिना धुली जींस और उस पर काली सैंडल की एक अलग भाषा होती है, वहीं आकर्षक हील्स, फिट टी-शर्ट तथा घुटनों से नीचे आती जींस और यदा कदा पहनी जाने वाली पोशाकों की भाषा अलग होती है।

पर सचाई यही थी कि वे सभी एक ही चीज जताने की कोशिश कर रहे थे कि पश्चिमी पहनावा ही स्मार्टनेस का प्रतीक है। जिन इक्का-दुक्का लड़कियों ने सलवार सूट पहना भी हुआ था, वह उनकी अरुचि की ही चुगली कर रहा था। न सिर्फ लापरवाही से दुपट्टे को गले में डाला हुआ था, बल्कि कुर्ते की फिटिंग और कट का बगैर ध्यान रखते हुए अपने शरीर को जबरदस्ती उसमें ठूंसा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि उनकी रुचि अपने कपड़ों में थी ही नहीं।

यही हाल साड़ी पहने महिलाओं का था। साड़ी का पल्लू उनके कंधों पर उसी प्रकार से पड़ा था, जिस प्रकार से एक वेटर अपने कंधे पर तौलिया डाले रहता है। हालांकि उनकी चोली उनकी साड़ी से मैच कर रही थी, पर वह भी बेहयाई और बेहूदेपन की प्रतीक अधिक थी। मैं पसोपेश में थी कि क्या आज के दौर में साड़ी को उसकी गरिमा और स्टाइल के साथ पहन गर्व महसूस करने वाली कोई महिला नहीं है? बिलकुल है, लेकिन वहां नहीं थी, जहां मैं उन्हें तलाश कर रही थी। हालांकि मैं जिन्हें देख रही थी वे भी भारतीय थे, जो सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, जिन्हें पूरी दुनिया आज जानती है। जो जीवन की नई इबारत लिखने में मशगूल हैं।

इसके हफ्ते भर बाद मैं एक फैशन वीक में गई, जहां स्टाइल स्टेटमेंट निश्चित रूप से भव्य व नए थे पर उनके रंग-ढंग भी पश्चिमी ही थे। आकर्षक, ब्रांडेड, सही कट-स्वरूप के वे पश्चिमी परिधान गर्व के साथ पहने जा रहे थे। कुछ अलग दिखने के लिए उस शाम मैं साड़ी पहन कर गई थी। मेरी साड़ी सिल्क की थी जो कि भारतीय परंपराओं का प्रतीक है और जिसके बारे में बात करते हुए हमें गर्व महसूस होता है। मैं अगर प्रयास भी करती तो उस शाम इससे अधिक विशिष्ट नहीं हो सकती थी।

एकाएक प्रत्येक व्यक्ति यह जानने को उत्सुक हो गया कि यह साड़ी कहां की है, किस डिजाइनर ने बनाई है। जबकि सचाई थी कि यह किसी डिजाइनर की डिजाइन की हुई साड़ी नहीं थी और न ही मैं किसी डिजाइनर के कपड़े पहनती हूं। जिस साड़ी ने लोगों की जिज्ञासा को बढ़ा दिया था वह बंगाली सिल्क की एक साड़ी थी, जो कि शादी की पहली वर्षगांठ पर मेरे पति लाए थे। लाल बॉर्डर के साथ सफेद सिल्क की साड़ी बंगाल का प्रतीक है, पर मेरे लिए यह उससे कहीं अधिक नारीत्व का सूचक है।

जाहिर है कि जिन लोगों को अपनी समृद्ध वस्त्र परंपरा की जानकारी थी वे जानते थे कि मैंने क्या पहना हुआ है। मेरे और उन जैसे लोगों के अलावा अन्य किसी ने सिल्क की साड़ी के बारे में सुना नहीं था। उन्हें नहीं मालूम था कि यह प्रत्येक कद्रदान और पारखी भारतीय महिला के वार्डरोब में जरूर होती है। साड़ी के प्रति अनजान लोगों की इस जमात में उस इवेंट की कवरेज को आए युवा पत्रकार भी थे। यह देख मेरे दिमाग में अगले ही पल एक अन्य विचार कौंधा। मुझे याद आया कि जब मैं युवा थी, तो मैं ‘प्रोफेशनल’ दिखने के लिए पैंट-टॉप तो पहन लेती थी, लेकिन जींस की हमेशा विरोधी रही।

इसी तरह जब भी मैं भारतीय नारी और सुकुमारी होने का अहसास चाहती थी तो लंबी स्कर्ट्स और चूड़ीदार कुत्र्ता के संग्रह का आनंद उठाती थी। इसी के कुछ दिन बाद मुझे एक पंक्ति पढ़ने को मिली, जिसका अर्थ था कि कभी भी एक ही रवैये के गुलाम मत बनिए। उसे पढ़ मुझे लगा कि काश मैं भारतीय महिलाओं को यह बात समझा पाती। काश उन्हें बता पाती कि हमारे पास पहनावे की इतनी समृद्ध परंपरा है, फिर भी हम जींस-टॉप में ही कैद क्यों रहते हैं!





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