दृष्टिकोण. आर्थिक सुधारों के बाद हुए विकास के हालिया दौर में समाप्त हुआ वित्तीय वर्ष 2007-08 एक टर्निग प्वाइंट रहा। सिर्फ इसलिए नहीं कि इस वर्ष पहली बार शेयर बाजार की उल्लेखनीय तेजी को पीछे पलटते देखा गया, बल्कि उन संकेतों के लिए जिनसे यह लगा कि सरकार की मुद्रास्फीति की दर कम रखकर, विकास दर तेज बनाए रखने की नीति सफल नहीं रही। हालिया पांच वर्षो की सबसे उल्लेखनीय बात रही भारत के सकल घरेलू उत्पाद की दर में सतत वृद्धि।
सरकारी आंकड़ों की भाषा में कहें तो 2006-07 में भी जीडीपी की दर 9.6 फीसदी रही। इसके पहले 2003-04 से 2006-07 के वित्तीय वर्षो में यह विकास दर 8.75 रही थी, जबकि इस दशक के शुरुआती तीन वर्षो में तुलनात्मक रूप से विकास दर 4.67 फीसदी रही। वर्ष 2007-08 के लिए भी अनुमान है कि वास्तविक विकास दर 8.7 फीसदी रहेगी। जाहिर है कि लगभग 9 फीसदी विकास दर पांच साल तक बने रहना एक नए अध्याय का संकेत है।
हालांकि इस विकास दर के कुछ पहलू ऐसे भी हैं, जिन पर सावधानी से निगाह रखनी होगी। सर्वप्रथम तो विकास दर के इस सफर में कृषि के रूप में एक सशक्त पहलू छूट गया है। यद्यपि 2005-06 में कृषि की विकास दर में सुधार के कुछ संकेत देखने को मिले, जब 5.9 फीसदी विकास दर हासिल की गई। इसके बाद ही यह आंकड़ा 3.8 फीसदी पर आ गिरा और ऐसी संभावना है कि वर्ष 2007-08 में इसमें और भी गिरावट आएगी।
आर्थिक सर्वेक्षण में भी खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में वर्ष 2007-08 में विकास दर 4.2 से 0.9 फीसदी पर आ जाने की संभावना जताई गई है। चिंतित करने वाला दूसरा पहलू है विकास दर की गति कम होने के संकेत। वित्त मंत्री ने वर्ष 2007-08 के अपने बजट भाषण में कहा भी, ‘हमारी अर्थव्यवस्था तेज विकास दर वाले एक और वर्ष का रिकार्ड बनाने को तैयार थी। सच तो यह है कि वर्ष 2007-08 की पहली छमाही में विकास दर 9.1 फीसदी रही भी, लेकिन अगस्त 2007 से बाजार में मची उथल-पुथल से अभी तक उबरा नहीं जा सका है।’ पिछले ही दिनों गिरावट के और संकेत देखने को मिले। अगर यह स्थिति बरकरार रहती है, तो अभूतपूर्व विकास दर पर असर पड़ना तय है।
हालांकि सबसे चिंतनीय पहलू है हाल के दिनों में मुद्रास्फीति का बढ़ना। मार्च के अंत में जारी आंकड़ों के मुताबिक मुद्रास्फीति की दर 6.68 फीसदी पहुंच गई, जो पिछले 13 माह की सर्वाधिक दर थी। और तो और मुद्रास्फीति ने चहुंओर अपना प्रभाव छोड़ा। प्राथमिक वस्तुओं पर मुद्रास्फीति की दर 7.76 आंकी गई, तो डेयरी उत्पादों पर 9.28 फीसदी। खाद्य तेलों पर 19.03 तथा लोहे और स्टील के भाव भी 26.86 फीसदी बढ़ गए। यही नहीं आम आदमी से जुड़ी खुदरा कीमतों में भी भारी उछाल आया।
सरकार के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली के खुदरा बाजार में मूंगफली का तेल 98 रुपए प्रति किलो से बढ़कर 121 रुपए पहुंच गया, सरसों का तेल 55 से 79 रुपए, वनस्पति 56 रुपए से 79 रुपए, चावल 15 रुपए से 18 रुपए, गेहूं 12 रुपए से 13 रुपए और अरहर की दाल 35 रुपए से 42 रुपए प्रति किलो हो गई। इनके लिए तमाम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारण जिम्मेदार हैं। हाल के महीनों में पूरी दुनिया में खाद्यान्न खासकर अनाज के मूल्यों में जबरदस्त वृद्धि हुई है। भारत अपने घरेलू घटनाक्रम के कारण इसका शिकार बना, सरकार द्वारा निजी क्षेत्रों, विशेषकर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को घरेलू बाजार में प्रवेश की अनुमति देने से स्थिति गंभीर हुई।
वर्ष 2006-07 में गेहूं का अनुमानित उत्पादन 75 मिलियन टन रहा, जबकि पिछले वर्ष यह 69 मिलियन टन था। फिर भी सरकारी गेहूं की खरीद का दाम बाजार दाम से कम होने से सरकारी खरीद अपेक्षा से कम रही। सरकार ने 8.5 रुपए प्रति किलो गेहूं का खरीद मूल्य रखा, जबकि बाजार मूल्य 10 से 12 रुपए प्रति किलो था। फिर भी वर्ष 2006-07 में सरकार 11.1 मिलियन टन गेहूं खरीदने में कामयाब रही, जो वर्ष 2005-06 के 9.2 मिलियन टन से ज्यादा थी।
इसके विपरीत वर्ष 2003-04 और 2004-05 में सरकार क्रमश: 16.8 मिलियन और 14.8 मिलियन गेहूं खरीदने में सफल रही थी। इस लिहाज से सरकारी खरीद में भारी गिरावट दर्ज की गई। भारतीय खाद्य निगम के मुताबिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए वर्ष 2001-02 के कुल उत्पादन के 30 फीसदी की खरीद के विपरीत वर्ष 2006-07 में 15 फीसदी खरीद ही हो पाई। जाहिर है बफर स्टॉक अपेक्षित मात्रा में नहीं रहे।
कमीशन फॉर एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एंड प्राइसेस के मुताबिक केंद्रीय पूल में 1 अक्टूबर 2008 को चावल का स्टॉक सिर्फ 5.49 मिलियन टन होगा, जो बफर पैमाने के 5.20 मिलियन टन से जरा सा अधिक है। गेहूं का स्टॉक 10.12 मिलियन टन रहेगा, जो 11 मिलियन टन के बफर पैमाने से कहीं कम होगा। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार खाद्यान्न आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा खर्च कर रही है। वर्ष 2006 और 2007 के दौरान केंद्र ने 7.5 मिलियन टन गेहूं आयात किया। दुनिया में चल रहे ऊंचे दामों के चलते सरकार को आयात के लिए कहीं अधिक मूल्य चुकाना पड़ा। यह मूल्य घरेलू किसानों को दिए जाने वाले समर्थन मूल्य से कहीं ज्यादा था। इसी वजह से मुद्रा स्फीति बढ़ी।
पेट्रो मूल्य वृद्धि भी इसमें जोड़ कर देखी जाए तो स्थिति और स्पष्ट होती है। सरकार ने पेट्रोल में 2 रुपए और डीजल में एक रुपए प्रति लीटर की मूल्य वृद्धि को जरूरी और मामूली बताया। हालांकि सिर्फ यही एकमात्र विकल्प नहीं था। अप्रत्यक्ष करों के रूप में पेट्रोलियम क्षेत्र से केंद्र को 93,804 करोड़ रुपए और राज्य सरकारों को 62,121 करोड़ रुपए की आय होती है। केंद्र की प्रत्यक्ष करों से भी आय बढ़ी है। इसके बाद यदि सरकार अप्रत्यक्ष करों में कटौती कर तेल कंपनियों को मूल्य बढ़ाने की अनुमति दे देती तो इससे खुदरा कीमतों पर प्रभाव नहीं पड़ता।
यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि पेट्रो उत्पादों की कीमतों का प्रभाव अन्य वस्तुओं पर भी पड़ता है। इस प्रकार खाद्यान्न और तेल की घरेलू मूल्य वृद्धि अंतरराष्ट्रीय मूल्य वृद्धि के कारण हुई, जिसके लिए सरकार की नीतियां ही अधिक जिम्मेदार मानी जाएंगी। साथ ही इसके लिए हाल के वर्षो में वैश्विक बाजार के साथ अत्यधिक जुड़ाव भी जिम्मेदार है। इस लिहाज से देखें तो बीता वित्तीय वर्ष अत्यधिक उदारवाद के औचित्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
-लेखक जेएनयू में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।