जयपुर.
प्रदेश में चल रहे 110 पेपर स्कूल बंद होंगे। सरकार ने इन्हें नए शिक्षा सत्र से बंद करने का फैसला किया है। इनके अलावा 129 अनार्थिक स्कूलों को अन्य स्कूलों में मिलाया जाएगा। इनके शिक्षक-कर्मचारियों को अन्य स्कूलों में लगाया जाएगा। ऐसे ज्यादातर स्कूल जनप्रतिनिधियों की सिफारिश पर खोले गए थे और ये सरकार के लिए घाटे का सौदा साबित हो रहे थे। इन स्कूलों में से ज्यादातर में विद्यार्थियों की कमी है। कई स्कूलों में तो शिक्षकों की संख्या विद्यार्थियों से ज्यादा है। इस कारण शिक्षकों का वेतन सरकार के लिए बेमानी साबित हो रहा था। कागजी स्कूलों की सर्वाधिक संख्या जयपुर में है। यहां 17, चूरू में 15 और जालोर में 13 स्कूल हैं। अनार्थिक स्कूल नागौर जिले में सर्वाधिक 20, जालोर में 11 और जयपुर में 7 हैं।
कहां-कितने पेपर स्कूल :
डूंगरपुर- 3, बांसवाड़ा-5, राजसमंद, धौलपुर, पाली, जोधपुर-1-1, सिरोही, जैसलमेर, अजमेर-2-2, जालोर-13, नागौर-6, कोटा-8, जयपुर- 17, सीकर, अलवर-6-6, चूरू -15, श्रीगंगानगर-10, बीकानेर-8, झुंझुनूं- 3
मर्ज हुए अनार्थिक स्कूल
हनुमानगढ़, धौलपुर, टोंक, उदयपुर-1, राजसमंद, बांसवाड़ा-9-9, चित्तौड़गढ़, बूंदी, सिरोही, अजमेर, सवाईमाधोपुर, भरतपुर-2-2, कोटा-8, नागौर-20, जालौर-11, बीकानेर, जोधपुर-4, जयपुर-7, दौसा-3, सीकर-4, करौली-4, श्रीगंगानगर-16, चूरू-3, झुंझुनू- 10
‘‘सरकार पर भार बन रहे स्कूलों के बारे में फैसला करना जरूरी था। इनके शिक्षकों व कर्मचारियों को अन्य स्कूलों में समायोजित किया जाएगा।
-वासुदेव देवनानी, शिक्षा राज्य मंत्री
‘‘सरकार को स्कूल खोलने से पहले हर दृष्टि से आकलन करना चाहिए। संबंधित इलाके के पहुंच वाले आदमी के दबाव में स्कूल खोलने की परंपरा को बंद करना चाहिए। प्राइवेट स्कूलों के प्रति बढ़ता रुझान भी साफ हो रहा है।
-नारायणसिंह, प्रवक्ता, पंचायती राज शिक्षक संघ
‘‘सरकारी नीतियों के चलते स्कूलों को बंद करने की नौबत आई है, पर सवाल यह उठता है कि जब विद्यार्थी ही नहीं थे तो स्कूल क्यों खोले गए ?
-पुष्पेंद्र भारद्वाज, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष राजस्थान विवि
क्या हैं अनार्थिक और कागजी
अनार्थिक स्कूल वे हैं, जो चल तो काफी समय से रहे हैं, लेकिन उनमें विद्यार्थी नहीं के बराबर हैं। इस कारण शिक्षक कई दिन तक इनमें आना मुनासिब नहीं समझते। ऐसे में यहां कार्यरत शिक्षक व कर्मचारियों को बिना काम तनख्वाह देनी पड़ रही थी। पेपर स्कूल कागजों में तो चल रहे हैं, लेकिन जमीनी तौर पर अस्तित्व में नहीं आए।