लंदन. क्या आप जानते हैं कि कलियों पर मंडराने वाला भौंरा ही शानदार इंजिनों, दवा देने वाले इनहेलरों और आग बुझाने वाले यंत्रों में इस्तेमाल होने वाली ‘स्प्रे तकनीक’ का शिक्षा है। एक नये अध्ययन से यह बात सामने आई है।
यह नयी तकनीक स्प्रिंग पर आधारित पुरानी तकनीक की अपेक्षा ज्यादा असरदार हो सकती है।
मुख्य रुप से एशिया और अफ्रीका में पाया जाने वाला एक खास प्रजाति का भौंरा, परभक्षी चिड़िया और मेंढ़कों से अपने बचाव के लिए एक जहरीले द्रव का तेजी से छिड़काव करता है। यह जहरीला छिड़काव आठ इंच की दूरी तक जाता है।
अध्ययन में पाया गया कि इन भौंरों के पेट में ‘हाइड्रोक्विनोन’ और ‘हाइड्रोजन-पेराक्साइड’ नामक गैस बनती है। उसके बाद ये एक जुड़े हुए ‘दहन-कक्ष’ (के बस्टन चैम्बर) में आपस में मिलती हैं जिससे जहरीली ‘बेंजोक्विनोन’ पैदा होता है।
भौंरा अपने शत्रुओं पर इसी जहरीले द्रव का छिड़काव करता है। भौंरों की इस सुरक्षा प्रक्रिया का मुख्य भाग उसके दहन कक्ष के शरू और अंत में लगे ‘वाल्व’ होते हैं।
इन गैसों के मिश्रण के तैयार होते ही बाहरी ‘वाल्व’ खुलता है और जहरीला द्रव्य तेजी से बाहर निकलता है। लीड्स विश्वविद्यालय और स्वीडिश बायोमिमेटिक्स द्वारा किये गए इस अध्ययन के निष्कर्ष ‘फिजिक्स वर्ल्ड’ नाम• जर्नल के अप्रैल अंक में प्रकाशित होंगे।