विडंबना ही है कि जिंदगी पहले परीक्षा लेती है, फिर सबक सिखाती है। लेकिन पाठशाला में पहले पाठ पढ़ाया जाता है, फिर इम्तिहान लिया जाता है। आज यह परीक्षा बच्चों, अभिभावकों तथा अध्यापकों के लिए सिरदर्द बन चुकी है। परीक्षा के तनाव से त्रस्त कई बच्चे हर साल अपनी जान दे देते हैं। थमने की बजाय यह प्रवृत्ति बढ़ती ही जा रही है। परीक्षाओं के दौरान विद्यार्थियों द्वारा जान देने के मामले की गूंज इस बार संसद में भी सुनाई दी है। बच्चों के लिए सांसदों की पलकें भीगी हैं और गले भर आए हैं।
जनप्रतिनिधियों तथा पीड़ित परिवारों ने परीक्षाओं की खामियों पर उंगली उठाई है। वास्तव में हमारी परीक्षा पद्धति का स्वरूप ही ऐसा है कि बच्चों को साल भर में की गई पढ़ाई महज सवा तीन घंटे में उत्तर पुस्तिका पर साबित करनी पड़ती है। मासूम बच्च पहले तो भारी-भरकम बस्ता उठाकर घूमता रहे और साल के अंत में तनाव भरे माहौल में बिना रुके, बिना थके एक साल में अर्जित ज्ञान को उत्तर पुस्तिका पर उकेरे। शिक्षा प्राप्ति सहज-सरल प्रक्रिया न होकर पीड़ादायक और तनावपूर्ण बन गई है। अलग-अलग मानसिक स्तर एवं सामथ्र्य वाले बच्चों का एक ही ढंग से मूल्यांकन करना, एक ही पाठ्यक्रम से तीन अलग-अलग कोड वाले प्रश्नपत्र तैयार करना कितना न्यायोचित है?
अंधी प्रतियोगिता के युग में बच्चों से अभिभावकों की अपेक्षाएं भी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई हैं। बच्चे की मानसिक क्षमता पर ध्यान दिए बगैर अभिभावक चाहते हैं कि उनके बच्चे डॉक्टर-इंजीनियर ही बनें ताकि समाज में उनका रुतबा बढ़े। कोठी, कार, कंप्यूटर और महंगे मोबाइल आदि के बाद बच्चे द्वारा 90 फीसदी से ज्यादा अंक लाना भी स्टेटस-सिंबल बन गया है। मेरिट में आए बच्चे की अखबार में फोटो छपवाना जरूरी हो गया है।
निजी कोचिंग केंद्र भी अच्छे अंक हासिल करने वाले विद्यार्थियों के फोटो छपवाकर अपनी दुकानदारी चमकाते हैं। जैसे-तैसे बच्चों को पास करवाकर जहां कई अध्यापक हर पल लटकती परिणामों की तलवार से बचना चाहते हैं, वहीं कई अन्य ट्यूशन का धंधा बढ़ाने की फिक्र में रहते हैं। ऐसे में बच्चों पर हर तरफ से अनावश्यक दबाव पड़ता रहता है क्योंकि शिक्षा के केंद्रबिंदु तो वही हैं। दबाव के कारण ही बच्चों में नकल का सहारा लेकर पास होने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।
दुर्भाग्यवश कुछ अध्यापकों द्वारा नकल को बढ़ावा देने के कारण समस्या बद से बदतर हो गई है। परीक्षाओं में खुलेआम नकल के कारण सालभर मेहनत करने वाले विद्यार्थी खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। मानसिक तौर पर प्रताड़ित ऐसे विद्यार्थी भीतर ही भीतर कुढ़ते रहते हैं, लेकिन उनकी व्यथा सुनने वाला कोई नहीं होता। नकल में सहायक होने के कारण अध्यापकों की समाज में प्रतिष्ठा कम हो रही है और मेहनतकश विद्यार्थियों के लिए परीक्षाएं हौआ बन गई हैं। तनाव के कारण बच्चों की नींद उड़ जाती है, भूख कम हो जाती है और वे हर वक्त सिरदर्द की शिकायत करने लगते हैं।
मां-बाप की असीम आकांक्षाओं का दबाव सहने वाले कई बच्चे कम अंक आने पर जान तक दे देते हैं। सवाल है कि बच्चों को अवसाद में धकेलने वाली ऐसी परीक्षाओं का औचित्य क्या है? क्या परीक्षाएं जिंदगी से अधिक महत्वपूर्ण हैं? क्या इन परीक्षाओं में फेल होने वाला बच्च हरेक क्षेत्र में फिसड्डी हो जाता है?
यह कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनके उत्तर तलाशे बिना कई बच्चों की बेवक्त मौत और हजारों अन्य के अवसादग्रस्त होने की समस्या को दूर नहीं किया जा सकता। परीक्षाओं के मौजूदा र्ढे से कोचिंग, ट्यूशन, गाइड और गैस-पेपर आदि का गोरखधंधा खूब फल-फूल रहा है। परीक्षा परिणामों के आधार पर शिक्षा की बड़ी-बड़ी दुकानें चला रहे लोग अभिभावकों का तो शोषण कर ही रहे हैं, बच्चों पर भी अन्याय कर रहे हैं। बीते साठ साल में विज्ञान ने खूब तरक्की की है। हर क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं, सिलेबस बदले हैं, पढ़ाने का तरीका बदला है, लेकिन परीक्षा प्रणाली में सुधार क्यों नहीं हो रहा?
अब वक्त आ गया है कि विद्यार्थी, अध्यापक एवं अभिभावक एकजुट होकर पूरी ताकत से नकल का विरोध करें, ताकि कोमल बच्चों को बेवक्त मुरझाने से बचाया जा सके। बच्चों को परीक्षा के तनाव से बचाने के लिए परीक्षा प्रणाली में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। इसके लिए एनसीईआरटी द्वारा की गई ग्रेडिंग सिस्टम की अनुशंसा को आजमाया जा सकता है। विज्ञान और गणित जैसे विषयों की ऑनलाइन परीक्षा ली जा सकती है।
ऐसा करने पर विद्यार्थियों, अभिभावकों तथा कई अध्यापकों के चाहने पर भी नकल संभव नहीं हो पाएगी। मासूम बच्चों को कई-कई माह के तनाव से बचाने के लिए तमाम शिक्षाविदों, शिक्षा अधिकारियों व मंत्रियों को बिना विलंब विचार करना चाहिए। बच्चों, अध्यापकों तथा अभिभावकों के हृदय परिवर्तन के बगैर नकल और कई बच्चों के अवसादग्रस्त होकर जान देने की प्रवृत्ति थम नहीं पाएगी।
-लेखक राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त अध्यापक हैं।