दृष्टिकोण. साठ साल बाद अब पाकिस्तान का पुण्योदय हो रहा है। पिछले 60 साल में किसी भी प्रधानमंत्री को संसद ने कभी सर्वसम्मति से वैसे स्वीकार नहीं किया, जैसे सैय्यद यूसुफ रजा गिलानी को किया है। हारी हुई मुस्लिम लीग (कायदे आजम) ने भी गिलानी का समर्थन किया है। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान में जनमत की आंधी कितनी प्रबल है। गिलानी के विरोध का मतलब होता मुशर्रफ का समर्थन! ऐसा लगता है पाकिस्तान के सभी दल अब लोकतंत्र की राह पर चलना चाहते हैं और फौज से अपना पिंड छुड़ाना चाहते हैं।
गिलानी को प्रधानमंत्री बनाकर पीपीपी के नेता आसिफ अली जरदारी ने एक तीर से दो शिकार किए हैं- पहला तो यह सिद्ध किया है कि वे पाकिस्तान की राजनीति में सिंधीवाद नहीं चलाना चाहते। अकेला पंजाब शेष सभी प्रांतों को मिलाकर भी उनसे बड़ा है। पंजाबी प्रधानमंत्री न सिर्फ बहुसंख्यक का प्रतिनिधित्व करेगा, बल्कि यदि आगे जाकर नवाज शरीफ की पार्टी से टक्कर होगी, तो यह पंजाबी प्रधानमंत्री बहुत काम आएगा।
दूसरा, गिलानी को आगे बढ़ाकर जरदारी ने सिंधी नेता मख्दूम अमीन फहीम को फीका कर दिया है। बेनजीर की अनुपस्थिति में वे ही पार्टी चला रहे थे। वे लोकप्रिय भी थे। उनका जनाधार भी था। वे प्रधानमंत्री बन जाते, तो उन्हें हटाना मुश्किल हो जाता। प्रधानमंत्री बनने के पहले ही मुशर्रफ और अमेरिकियों से उनके गुप्त संबंधों की अफवाहें फैलने लगी थीं। गिलानी को प्रधानमंत्री बनाकर जरदारी ने मुशर्रफ विरोधी तत्वों को खुश कर दिया है।
गिलानी को मुशर्रफ ने पांच साल तक जेल में बंद रखा और बेनजीर का साथ छोड़ने के लिए प्रलोभन भी दिया, लेकिन वे फिसले नहीं। यों तो गिलानी जरदारी के लिए प्रधानमंत्री पद कभी भी छोड़ सकते हैं, लेकिन यह भी संभव है कि जरदारी सोनिया गांधी की राह पर चल पड़ें और गिलानी पूर्णावधि तक टिके रहें। जरदारी के लिए यही सौदा ज्यादा फायदेमंद है।
गिलानी के बाद अब उनके मंत्रिमंडल ने भी शपथ ले ली है। पीपुल्स पार्टी और मुस्लिम लीग में जैसी खींच-तान की आशंका थी, वैसी हुई नहीं। गृह, विदेश, रक्षा जैसे मंत्रालय पीपुल्स पार्टी के पास हैं और वित्त तथा अन्य मंत्रालय लीग और अवामी पार्टी के पास। ऐसी व्यापक गठबंधन वाली सरकार भी पाकिस्तान में पहली बार बनी है। पंजाब, सिंध, सूबा सरहद और ब्लूचिस्तान के दलों का यह गठबंधन वास्तव में एक राष्ट्रीय सरकार जैसा ही है।
यदि मंत्रालयों के लिए ये दल आपस में लड़ते, तो इसका फायदा मुशर्रफ को मिलता। मुशर्रफ को पता है कि उनके दिन गिने-चुने हैं। लेकिन वे इसी उम्मीद पर टिके हुए हैं कि ये राजनीतिक दल आपस में लड़ें और उनकी छवि अचानक चमक उठे, पर अब ऐसा होना कठिन है क्योंकि प्रधानमंत्री गिलानी ने दो टूक शब्दों में कहा है कि वे र्मी घोषणा के मुताबिक 30 दिनों में जजों की वापसी करेंगे अर्थात इफ्तेखार चौधरी फिर से चीफ जस्टिस के रूप में मुशर्रफ के चुनाव को अवैध घोषित करेंगे।
मुशर्रफ के चुनाव के अवैध घोषित होने पर पाकिस्तान में असली राजनीति की शुरुआत होगी। यह संभव है कि मुशर्रफ चुपचाप इस्तीफा दें और खुद ही देश निकाला ले लें। दूसरा विकल्प यह है कि वे राष्ट्रपति के अधिकार का इस्तेमाल करके दोबारा आपातकाल थोप दें, संसद भंग कर दें और पुराने जजों को शपथ ही न लेने दें। यह संभावना बहुत क्षीण है क्योंकि न तो फौज उनका साथ देगी, न अमेरिका और न ही मीडिया। यदि उन्होंने मनमानी की, तो पाकिस्तान में खून की नदियां बहेंगी। जबरदस्त जन-आंदोलन का आगाज हो जाएगा।
अगर मुशर्रफ विदा हो गए, तो वह गोंद सूख जाएगा, जो जरदारी और नवाज शरीफ को जोड़े हुए है। दोनों प्रमुख दल अपनी-अपनी राजनीति खेलना शुरू करेंगे। यह खेल इतना बिगड़ सकता है कि न चाहते हुए भी फौज को हस्तक्षेप करना पड़े। यदि ऐसा हुआ तो यह पाकिस्तान का दुर्भाग्य होगा। यही डर शायद इस गठबंधन सरकार को लंबे समय तक बांधे रहेगा।
फिलहाल प्रधानमंत्री गिलानी ने जो घोषणाएं की हैं, उनसे आशा बंधती है कि यह नई गठबंधन सरकार कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएगी। सबसे पहले तो वह पाकिस्तान को अमेरिका का दुमछल्ला बने रहने से रोकेगी। कबाइली इलाकों में अंधाधुंध बमबारी करने की बजाय वह तालिबान और अल-कायदा के लोगों से बात करेगी। गिलानी ने साफ-साफ कहा है कि वे 1901 में बने सरहदी अपराध कानून को खत्म करेंगे।
अमेरिकी उप-विदेशमंत्री जॉन नेग्रोपांट को नवाज शरीफ ने दो टूक शब्दों में कहा कि आपके आतंकवाद विरोधी युद्ध में हम आपका साथ जरूर देंगे, लेकिन यह नहीं हो सकता कि आपके गांव और शहर तो सुरक्षित हो जाएं और हमारे शहर और गांव ‘मौत के मैदान’ बन जाएं। प्रधानमंत्री गिलानी ने भी अमेरिकी नेताओं से कह दिया है कि अब पाकिस्तान की नीति का निर्धारण एक व्यक्ति नहीं, संसद करेगी। नई सरकार बनने के मौके पर अमेरिकी नेताओं की उपस्थिति को पाकिस्तानी जनता ने अच्छा नहीं माना है। जरदारी का पहले अमेरिकी राजदूत से मिलना भी बुरा माना गया था। इसका अर्थ यह हुआ कि बेनजीर और बुश प्रशासन के बीच जो गुप्त समझौता हुआ था, अब उसका चल पाना मुश्किल होगा। नई सरकार नई लीक पर चल रही है।
यदि पाकिस्तान अमेरिकी चंगुल से निकल गया, तो वह भारत के प्रति भी रचनात्मक रवैया अपना सकता है। पाकिस्तान अमेरिका का सहारा इसलिए लेता है कि उसे भारत का विरोध करना होता है। नई सरकार भारत से अच्छे संबंध बनाएगी यह बात जरदारी, नवाज और गिलानी तीनों ने कही है। वे कश्मीर पर कुछ न कुछ बोलते जरूर रहेंगे। यह उनकी राजनीतिक मजबूरी है, लेकिन वे भारत-पाक संबंधों को कश्मीर का बंधक नहीं बनने देंगे। वैसे भी अभी पाकिस्तान अपनी आंतरिक उलझनों में इतना फंसा रहेगा और भारत भी चुनावी दौर में इतना उलझ जाएगा कि कश्मीर का सवाल अपने आप दरी के नीचे सरक जाएगा।
पाकिस्तान की नई सरकार के सामने आतंकवाद सबसे बड़ी चुनौती तो है ही लेकिन बढ़ती हुई महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और अराजकता ऐसी चुनौतियां हैं जिनका सामना किए बिना इस सरकार का चलना असंभव हो जाएगा। यदि यह नई राष्ट्रीय सरकार अमेरिका और फौज के शिकंजे से मुक्त हो गई, तो पाकिस्तान का कायाकल्प हो जाएगा। पाकिस्तान एक सभ्य, स्वस्थ और सच्चे सार्वभौम राष्ट्र की तरह सिर ऊंचा करके चल सकेगा।
-लेखक विदेश नीति विशेषज्ञ हैं।