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खाली जमीन की हकीकत बताए सरकार: हाईकोर्ट

जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह पृथ्वीराज नगर योजना में खाली जमीन की सर्वे रिपोर्ट छह सप्ताह में शपथपत्र के साथ पेश करे। साथ में यह भी बताए कि इस जमीन के उपयोग के बारे में उसकी क्या मंशा है।

न्यायाधीश ज्ञानसुधा मिश्रा व आर.एस. चौहान की खंडपीठ में मामले की सुनवाई के दौरान पृथ्वीराज नगर के सफल आवेदकों की तरफ से राजदीपक रस्तौगी का कहना था कि एक ओर सरकार अवाप्तशुदा जमीन पर अतिक्रमण करने वालों के मकान और जमीन नियमित कर रही है, दूसरी ओर सफल आवेदकों को दूसरी योजनाओं में भूखंड दिए जा रहे हैं। नगरीय विकास सचिव परविंदर पंवार ने बाकायदा इन भूखंडों को नियमित करने का शपथपत्र सरकार को दे रखा है। आमजन की ओर से एडवोकेट विमल चौधरी का कहना था कि सरकार के इस कार्य से अतिक्रमण करने वालों को बढ़ावा मिलेगा।

जेडीए की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता भरत व्यास ने कहा कि सरकार खाली जमीन पर अभी कुछ नहीं कर रही है। अदालत ने 21 अगस्त, 07 को सरकार से पूछा था कि पृथ्वीराज नगर में जिस भूमि पर निर्माण कार्य नहीं हुए हैं, उसके बारे में उसकी क्या योजना है।

रस्तौगी का कहना था कि सरकार ने इस योजना की खाली जमीन के बारे में सर्वे करा रखा है। इसकी रिपोर्ट हाईकोर्ट में मंगाई जानी चाहिए। राज्य सरकार ने 28 फरवरी, 08 को पृथ्वीराज नगर को अवाप्ति से मुक्त किए जाने की अधिसूचना वापस लेने की जानकारी हाईकोर्ट को दी थी। खंडपीठ ने अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देश दिया कि वे नगरीय विकास सचिव और जेडीए आयुक्त का शपथपत्र या अंडरटेकिंग पेश करें कि इस योजना की जमीन नियमित नहीं की जाएगी।

क्या है मामला

अशोक गहलोत के मुख्यमंत्रित्वकाल में सरकार ने 23 सितंबर, 02 को पृथ्वीराज नगर को अवाप्ति से मुक्त किए जाने की अधिसूचना जारी की थी। इस अधिसूचना पर हाईकोर्ट ने स्वप्रसंज्ञान लेते हुए अधिसूचना की क्रियान्विति पर यह कह कर रोक लगा दी कि सरकार जब एक बार कोई जमीन अवाप्त कर लेती है तो उसे पुन: मुक्त नहीं कर सकती।

अदालत ने सरकार से जवाब मांगा किन्तु सरकार ने जवाब नहीं दिया। बाद में भाजपा की सरकार के सत्ता में आने पर जून 2004 में हाईकोर्ट ने सरकार से पूछा कि पृथ्वीराज नगर के मामले में वह क्या कर रही है। मौजूदा सरकार ने भी कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद पिछले दिनों इस मामले में हुई कैबिनेट की बैठक में पृथ्वीराज नगर के नियमन का फैसला करते हुए राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में जवाब पेश किया और पूर्व में जारी अवाप्ति से मुक्ति की अधिसूचना वापस ले ली।





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