जयपुर. नए परिसीमन के बाद बनाई जाने वाली भाजपा की जिला एवं मंडल स्तरीय समन्वय समिति से जिलाध्यक्ष और मंडल अध्यक्षों के अधिकार कम होने की आशंका से नेताओं में घबराहट की स्थिति बनी हुई है। समन्वय समिति के गठन के बाद विधानसभा चुनावों में प्रत्याशी चयन के लिए होने वाली सिफारिश में अब अन्य लोगों का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। भाजपा कार्यसमिति की बैठक से कुछ समय पहले ही गाइडलाइन जारी की गई है।
पड़ सकता है दबाव :
गाइडलाइन में दिए प्रावधान के अनुसार कई वरिष्ठ लोग समिति में आने से वंचित रह जाएंगे। ऐसे में इन लोगों को शामिल करने के लिए दबाव पड़ सकता है। खासतौर से मोर्चो की ओर से इसके लिए पहल की जा सकती है।
कई वरिष्ठ लोगों को इसमें शामिल नहीं किया जा सकता। ऐसे लोगों की सेवाएं चुनाव के समय लेने के उद्देश्य से ही इन्हें समन्वय समिति में शामिल किया गया है। अन्य बड़े लोगों को प्रदेश स्तर की समिति में लिया जाएगा।
—ओमप्रकाश माथुर, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष
विधानसभानुसार समिति की गाइडलाइन
समन्वय समिति में मंडल अध्यक्ष (विधानसभा के अंतर्गत आने वाले) के साथ मंडल महामंत्री एवं दो वरिष्ठ कार्यकर्ता, प्रधान, पूर्व मंडल अध्यक्ष, विधायक, स्थानीय निकाय महापौर, सभापति, अध्यक्ष, यूआईटी चेयरमैन, जिला और उनसे ऊपर के पदाधिकारी जो उस विधानसभा में निवास करते हैं, पूर्व विधायक, पूर्व प्रधान और पूर्व जिला प्रमुख जो उस विधानसभा में निवास करते हैं, शामिल होंगे। इससे बाहरी व्यक्तियों के शामिल होने से मंडल अध्यक्ष की पॉवर कम होगी। जिला स्तरीय समिति की गाइडलाइन
जिला स्तरीय समन्वय समिति की गाइलाइन में छह मोर्चो के प्रदेश अध्यक्षों के लिए कोई प्रावधान नहीं है, वे अपने क्षेत्र में होने वाली बैठक में भी शामिल नहीं हो पाएंगे। ऐसे ही जिले की कार्यकारिणी से अध्यक्ष और सिर्फ दो महामंत्रियों के होने के साथ चार बाहरी लोगों के होने से जिलाध्यक्ष का पलड़ा कमजोर रहेगा।