जयपुर.
हिंदू संस्कृति में गोदान का धार्मिक महत्व है, लेकिन गुलाबी नगरी को अन्य राज्यों से 117 हाथी दान में मिलना किसी भी सरकारी अधिकारी की समझ से परे है।
राज्य में हाथियों के लिए प्रतिकूल मौसम होने के बावजूद बंगाल, असम सहित कई राज्यों के हाथी मालिक आमेर के हाथी मालिकों को हाथी दान करने के लिए बेताब हैं। असल में वन्यजीव संरक्षण की धारा 172 के तहत हाथियों की खरीद-फरोख्त पर रोक होने से असम व बंगाल के हाथियों के व्यापारी जयपुर के हाथी मालिकों से एक हाथी के बदले लाखों रुपए लेते हैं।
हाथी बेचने पर रोक को देखते हुए अधिकांश हाथी मालिक शपथ पत्र दायर करते हैं कि वे हाथी पालने में असमर्थ हैं और अपना हाथी जयपुर में अपने मित्र को दान करना चाहते हैं। इसके बाद राज्य सरकार हाथी दान करने की एनओसी जारी करती है।
एनओसी लेने के बाद हाथी को जयपुर लाया जाता है। राजस्थान का पर्यटन विभाग उसके बाद वन विभाग व अन्य राज्यों की एनओसी को देखते हुए हाथी का शारीरिक परीक्षण कर हाथी को पहचान चिह्न् के बतौर नंबर प्रदान करता है। इस प्रक्रिया के बाद हाथी मालिक बगैर कोई टैक्स भरे अन्य राज्य से मिले हाथी को राज्य का रजिस्टर्ड हाथी बनवा लेते हैं। इस पूरी कार्रवाई के दौरान पर्यटन और वन विभाग का कोई भी अधिकारी इस बात पर ध्यान नहीं देता कि रेगिस्तान में हाथी को रखना पशु के साथ ज्यादती ही है।
24 से शुरू अब 100 पार
1950 के बाद राजा मानसिंह के आदेश पर महावतों को 24 हाथी दान किए गए थे। उसके बाद आमेर में हाथियों को फेरा शुरू हुआ। 35 साल बाद 1985 में जयपुर में हाथियों की संख्या भी 35 हो गई। 1994 तक हाथियों की संख्या 50 को पार कर गई। और पिछले चार वर्षो में 100 से ज्यादा हो गए हैं।
जयपुर के कुल हाथी
मादा -- 111
नर -- 4
बच्चे -- 2
हाथी संख्या में जयपुर अव्वल
जयपुर एशिया का अकेला शहर है, जहां हाथियों के अनुकूल मौसम न होते हुए भी यहां इनकी संख्या बढ़ रही है। केरल के अनुकूल मौसम में भी ये 60 के करीब हैं।