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एसपीओ जाएंगे पुलिस में

रायपुर. बस्तर में 28 सलवा जुड़ूम शिविरों की सुरक्षा में लगाए गए एसपीओ को विधिवत फोर्स में शामिल करने की तैयारी है। बस्तर में 3400 एसपीओ हैं। इनकी नियुक्ति छत्तीसगढ़ पुलिस एक्ट 2007 की धारा-9 तथा पुलिस अधिनियम 1861 की धारा 17,18 और 19 के तहत की गई, लेकिन पुलिस चाहती है कि अब ये बाकायदा फोर्स का हिस्सा बनें। डीजीपी विश्व रंजन ने कहा कि जम्मू-कश्मीर और हिंसाग्रस्त नार्थ-ईस्ट में भी एसपीओ हैं। लेकिन इन्हें फोर्स में शामिल करने का कदम सिर्फ छत्तीसगढ़ ही उठाने जा रहा है।

सलवा जुड़ूम और एसपीओ की तैनाती के बाद नक्सलियों से लड़ाई में फोर्स को खासी मदद मिली है। डीजीपी के मुताबिक नक्सल हिंसा और परिवार के लोगों की हत्या की वजह से अरसे से जंगलों से आदिवासी जान बचाने के लिए बस्तर के बड़े कस्बों में आ रहे थे। इन्हें अलग-अलग 28 शिविरों में पनाह दी गई है। नक्सलियों ने ऐसे शिविरों पर भी बड़े हमले (रानीबोदली वगैरह) कर दर्जनों आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया। इसी वजह से शिविरों की सुरक्षा की जरूरत महसूस हुई। फोर्स की कमी थी, इसलिए पुलिस ने कानून के दायरे में रास्ता तलाशा।

पुलिस अधिनियम में एसपीओ की नियुक्ति का प्रावधान है, इसलिए इनकी नियुक्ति मानदेय पर की गई। हर शिविर की सुरक्षा में औसतन 120 एसपीओ लगाए गए हैं। शिविरों पर कातिलाना हमलों की वजह से एसपीओ को उस वक्त भी हथियार दिए जाने लगे हैं, जब ये फोर्स के साथ पहरेदारी कर रहे होते हैं। इनपर राहत शिविरों में रहनेवाले 45 हजार से ज्यादा आदिवासियों की सुरक्षा का जिम्मा है।

कोर्ट में पक्ष रखेगी पुलिस

नागरिकों को हथियार दिए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी के बाद शासन ने कानूनविदों से मशविरा शुरू कर दिया। डीजीपी ने कहा कि एसपीओ पुलिस कानून के तहत रखे गए हैं, इसलिए इस व्यवस्था में फेरबदल से पहले पुलिस भी अदालत में पक्ष रखेगी। एसपीओ हैं फोर्स के गाइड : एसपीओ बस्तर के उन जंगलों से ताल्लुक रखते हैं, जहां नक्सल गतिविधियां चरम पर है। उन्हें दुर्गम पहाड़-जंगलों और रास्तों की जानकारी है। इसलिए फोर्स इनका इस्तेमाल गाइड के रूप में कर रही है। आईजी नक्सल आपरेशंस गिरिधारी नायक ने बताया कि एसपीओ सर्चिग के दौरान फोर्स के साथ रहते हैं, इसलिए सुरक्षा के नजरिए से उन्हें हथियार दिए जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा : उल्लेखनीय है कि चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन और जस्टिस आफताफ आलम की बेंच ने नागरिकों को हथियार देने के मामले में कड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की बात भी कही है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर अफसर कुछ नहीं कह रहे, लेकिन गृह विभाग कानूनी तरीके से पक्ष रखने की एक्सरसाइज कर रहा है।





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