जामनगर में रहने वाला गिरिराज नाटुभा दूसरी जमात तक पढ़ा है। अपनी पूरी जिंदगी में उसे साधारण शब्दों को पढ़ने में भी दिक्कत होती रही। हालांकि कुछ साल पहले यह देख वह खुद भी आश्चर्य में पड़ गया कि अचानक उसे पढ़ना आ गया था। यह चमत्कार तब हुआ जब उसने गुजराती टेलीविजन पर फिल्मी गीतों पर आधारित कार्यक्रम ‘चित्रगीत’ देखना शुरू किया।
इस कार्यक्रम में टीवी स्क्रीन पर गीतों को सब-टाइटल्स के साथ दिखाया जाता है। चूंकि उसे कई गीतों के बारे में जानकारी थी, लिहाजा वह अगले शब्द को पहचान लेता। जब यह शब्द टीवी स्क्रीन पर आता, तो वह इसे पढ़ता और कराओके स्टाइल में साथ-साथ गुनगुनाता। जल्द ही उसने पाया कि वह शब्दों को पहचानने लगा था और अखबारों की हेडलाइंस पढ़ना भी उसे आ गया।
सामाजिक उद्यमी और आईआईएम, अहमदाबाद में प्रोफेसर डॉ. ब्रिज कोठारी के दिमाग की उपज ‘सेम लैंग्वेज सब-टाइटलिंग’ एक साधारण मगर जबरदस्त विचार है, जो वयस्कों और बच्चों में साक्षरता बढ़ाने की दिशा में कारगर साबित हो रहा है। जब फिल्मी गीतों के सब-टाइटल्स आते हैं, तो स्क्रीन पर कलाकारों की आवाज और उभरने वाले शब्दों में पूरा तालमेल होता है। दर्शक भी इस तरीके से बोले गए और स्क्रीन पर उभरे शब्दों के मध्य अवचेतन मन में तालमेल बैठा लेते हैं। इस तरीके से पढ़ना सीख रहे और शब्दों से जूझने वाले लोगों की क्षमता में काफी सुधार आता है।
कोठारी को अपने जबरदस्त शोध के नतीजों के लिए विश्व में सराहा गया है। 1999 में अहमदाबाद दूरदर्शन केंद्र के नए निदेशक ने उन्हें ‘चित्रगीत’ नामक एक गुजराती कार्यक्रम की चार कड़ियों में सब-टाइटल्स के प्रयोग की इजाजत दी। इसने गुजरात में ऐसी सनसनी फैलाई कि उन्हें इसे लगातार एक साल तक प्रसारित करने के लिए विवश होना पड़ा।
हालांकि डॉ. कोठारी के लिए सही मायने में पहला जबरदस्त मौका वर्ष 2002 में आया, जब दिल्ली में दूरदर्शन के नए महानिदेशक डॉ. एसवाई कुरैशी ने उन्हें दूरदर्शन के बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘चित्रहार’ में सब-टाइटल्स इस्तेमाल करने की इजाजत दे दी। इसके तुरंत बाद कोठारी को विश्व बैंक की ओर से ढाई लाख डॉलर का ग्लोबल इनोवेशन प्राइज मिला। उन्होंने इस पुरस्कार राशि को गीतों में सब-टाइटल्स बैठाने की लागत में गंवा दिया।
पिछले पांच साल से रविवार की सुबह देश के तकरीबन पंद्रह करोड़ लोग दूरदर्शन के बेहद लोकप्रिय गीतों के कार्यक्रम ‘रंगोली’ और ‘चित्रहार’ को सब-टाइटल्स के साथ देखते चले आ रहे हैं। नील्सन-ओआरजी ने सब-टाइटलिंग के प्रभाव का आकलन करने के लिए 2002 और 2007 में सर्वे किया। इससे पता चला कि पांच साल की विद्यालयीन शिक्षा के बाद महज 25 फीसदी स्कूली बच्चे हिंदी का साधारण सा पैराग्राफ पढ़ पाते हैं।
हालांकि 56 फीसदी लोग इसी पैराग्राफ को पढ़ सकते हैं, यदि हर हफ्ते तीस मिनट ‘रंगोली’ में इसकी सब-टाइटलिंग की जाती है। इसी तरह के नाटकीय परिणाम वयस्कों के बीच भी देखे गए। इस सफलता को देखते हुए दूरदर्शन ने उन्हें हर हफ्ते आठ क्षेत्रीय भाषाओं के फिल्मी गीतों के कार्यक्रमों में सब-टाइटल्स बनाने की इजाजत दे दी है। इस सफलता के मद्देनजर स्कूली शिक्षा और साक्षरता विभाग को सबटाइटलिंग के जारी रहने के आधार पर सतत रूप से कोष की व्यवस्था करनी चाहिए।
गीतों की सब-टाइटलिंग के जरिए टीवी कार्यक्रमों की रेटिंग्स में भी १क्-१५ फीसदी का इजाफा होता है। लोगों को उस गाने की शब्दावली देखना अच्छा लगता है, जिसे वे सुनते हैं। यह उन्हें टीवी पर फिल्मी सितारों के साथ गुनगुनाने में मददगार साबित होती है। इससे उन्हें गीतों के बोल याद रखने में भी मदद मिलती है। हैरानी है कि चैनलों ने सब-टाइटलिंग क्यों शुरू नहीं की, जबकि इससे कार्यक्रमों की रेटिंग बढ़ जाती है। मैं उम्मीद करता हूं कि बच्चों के पसंदीदा काटरून चैनल्स भी इस खेल में उतरेंगे और हमारे बच्चे मनोरंजन के साथ-साथ पढ़ना भी सीखेंगे।
आप सोचते होंगे कि लोकतंत्र में राजनीति ही बदलाव लाने का बेहतरीन जरिया है, लेकिन जब हमारे देश का राजनीतिक वर्ग अविश्वसनीय और पूरी तरह भ्रष्टाचार में लिप्त है तो हमें निजी व्यक्तियों पर ही निर्भर रहना होगा। हाल के वर्षो में हमने कारोबारी उद्यमियों के समूह देखे हैं और उन्होंने भारत को दुनिया की सबसे गतिमान अर्थव्यवस्थाओं में एक बनाने में काफी मदद की है। अब हमें सामाजिक उद्यमी भी पैदा करने होंगे, जो सामाजिक-शैक्षणिक बदलाव के कारक बनें। यही कारण है कि भारत का उदय हो रहा है, अपने राजनेताओं की वजह से नहीं, बल्कि इनसे इतर अन्य कर्मयोगियों के प्रयासों से।
-लेखक ‘मुक्त भारत’ के रचनाकार हैं।