विकास मंत्र. अगर हम अपने रोजमर्रा के व्यवहार पर नजर डालें, तो पता चलता है कि हम दूसरे लोगों के बारे में राय देने में स्वयं को विशेषज्ञ मानते हैं। फलां शख्स अच्छा है, फलां बुरा या फलां ईमानदार या फलां बेईमान आदि-आदि। फिर हमारी राय दूसरों के बारे में समय के साथ-साथ बदलती भी रहती है।
कल को हमने जिस शख्स को अच्छा करार दिया था, अगर वह हमारी किसी अपेक्षा पर खरा नहीं उतरा तो वहीं बुरा हो जाता है। इस कदर तेजी से हमारी राय बदलती रहती है। एक और रोचक बात यह है कि भले ही हम स्वयं अच्छे हों या बुरे, लेकिन दूसरे को अच्छा या बुरा साबित करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। बगैर यह सोचे-समझे कि बिना किसी ठोस आधार के दी गई राय का कोई मूल्य नहीं होता है।
नैतिकता का तकाजा तो यही है कि हम दूसरों के बारे में न तो राय व्यक्त करें और न ही किसी की आलोचना करें। यह काम सिर्फ ईश्वर या सिद्ध पुरुष का है। हम सभी में कुछ न कुछ कमियां विद्यमान हैं, तो दूसरों की अच्छाइयां या कमियां ढूंढ़ने वाले हम कौन होते हैं। फिर सबसे महत्वपूर्ण बात तो यही है कि दूसरों का आकलन करने के लिए पहले स्वयं की समझ भी उससे ज्यादा होनी चाहिए।
इस दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो नैतिक और चारित्रिक स्तर पर कहीं नहीं ठहरते, इसके बावजूद वे महान शख्सियतों के बारे में अपनी राय देने से बाज नहीं आते हैं। इस क्रम में सबसे रोचक बात यह भी है कि जो वास्तव में ज्ञानी और बुद्धिमान होता है वह न तो दूसरे की आलोचना करता है और न ही किसी के बारे में कोई टिप्पणी करता है। फिर अगर कोई शख्स वास्तव में बुरा, भ्रष्ट या बेईमान है तो उसके बारे में राय प्रकट करने से बेहतर होगा कि अप्रत्यक्ष रूप से उसे सुधारने के प्रयास किए जाएं। न सिर्फ अपने बल्कि दूसरों के विकास का यही बेहतर तरीका है।