दृष्टिकोण. तिब्बत पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बढ़ते दबाव और ओलिंपिक खेलों का समीप आता समय चीन की बेचैनी बढ़ा रहा है। चीन के सामने ऐसी विकट स्थिति तो थियानमेन चौक कांड के समय भी नहीं आई थी। चीन द्वारा कब्जा करने से पहले तिब्बत एक स्वतंत्र देश हुआ करता था आज हालात यह हैं कि तिब्बती अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो गए हैं।
चीन के विभिन्न प्रांतों से लाकर बसाई गई चीनी आबादी वहां दो-तिहाई हो गई है और मूल तिब्बती एक-तिहाई रह गए हैं। दलाई लामा कहते भी हैं कि ओलिंपिक के बहाने चीन अपने दस लाख और लोगों को लाकर तिब्बत में स्थाई रूप से बसाना चाहता है। ऐसी स्थिति में चीन के इस दावे पर कौन भरोसा कर पाएगा कि अल्पसंख्यक हो चुके और पारंपरिक रूप से शांतिप्रिय तिब्बती ल्हासा में चीन के खिलाफ हिंसक विद्रोह कर रहे हैं।
इससे ज्यादा तार्किक तो दलाई लामा की यह दलील लगती है कि टेलीविजन पर हिंसा करते जिन तिब्बतियों के फुटेज चीन ने जारी किए हैं, वे दरअसल बौद्ध भिक्षुओं के वेश में चीनी सैनिक थे। हालांकि ल्हासा की स्थिति की नुमाइश करने की गरज से चीन ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया को वहां का दौरा कराया, पर वहां से लौटकर आया अंतरराष्ट्रीय राजनयिकों का दल भी यह शिकायत कर रहा है कि सब कुछ ‘स्टेज मैनेज्ड’ था, जिसमें सरकारी अधिकारी और तथाकथित आम जनता एक ही ‘भाषा’ बोल रहे थे।
इसी बीच कुछ देशों के बीच बीजिंग ओलिंपिक के प्रतिकात्मक बहिष्कार के स्वर भी उठने लगे हैं। भारतीय फुटबॉलर बाइचुंग भूटिया की तरह थाईलैंड के मशहूर पर्यावरणविद नारीसा बोंजसे ने भी बीजिंग ओलिंपिक की मशाल थामने से मना कर दिया है और प्रसिद्ध फिल्म निर्माता स्टीवन स्पीलबर्ग ने भी इसके बहिष्कार का एलान किया है। हालांकि स्पीलबर्ग का बहिष्कार तिब्बत की वजह से नहीं, बल्कि सूडान की अधिनायकवादी हुकूमत को मिलने वाले चीन के राजनीतिक समर्थन की वजह से है।
फिर भी बीजिंग ओलिंपिक का बहिष्कार उस तरह नहीं होगा, जैसा 1980 में मास्को ओलिंपिक का नाटो देशों ने किया था या फिर 1984 में लॉस एंजिल्स के ओलिंपिक का वारसा पैक्ट के देशों ने किया था। वजह यह है कि तिब्बतियों की दयनीय और असहाय स्थिति विश्व मानवता के संवेदनशील हिस्से के मन में करुणा का संचार तो कर सकती है, पर वे किसी को कोई फायदा-नुकसान नहीं पहुंचा सकते।
तिब्बत की नैतिक शक्ति के सबसे बड़े प्रतीक पुरुष स्वयं दलाई लामा हैं, जो 1959 में ल्हासा से बचकर तवांग आ गए थे और तब से भारत के सम्माननीय अतिथि हैं। उनके साथ बहुत सारे तिब्बती अनुयायी भी यहां आ गए जिन्हें राजनीतिक शरणार्थी का दर्जा हासिल है। आज करीब पौने दो लाख तिब्बती शरणार्थी अपने धर्म-संस्कृति और विशिष्ट जीवन शैली को सीने से लगाए स्वदेश लौटने की प्रतीक्षा में दिन काट रहे हैं।
इनके आध्यात्मिक गुरु दलाई लामा दुनिया भर में तिब्बती आंदोलन के नेता माने जाते हैं, जिन्हें 1989 में शांति के नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। दलाई लामा गांधी के अनुयायी हैं और उनके ही सत्य, अहिंसा के हथियार से तिब्बत की लड़ाई जीतना चाहते हैं। 70-75 लाख तिब्बती एक अरब से ज्यादा आबादी वाले चीनियों में कितनी हलचल पैदा कर पाएंगे संभवत: इसका अहसास दलाई लामा को है इसलिए वे चाहकर भी चीन से पूर्ण स्वराज की मांग न करके सिर्फ तिब्बत की स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं। इसे दलाई लामा का मध्यमार्ग माना जाता है, लेकिन चीन ने दलाई लामा पर कभी भरोसा नहीं किया, उलटे वह उन्हें दुनिया भर में चीन के खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले षड्यंत्रकारी के रूप में निरूपित करता है।
चीन को लगता है कि दलाई लामा सिर्फ तिब्बत ही नहीं, बल्कि चीन के भीतर बौद्ध धर्म के अनुयायियों, जिनकी संख्या अच्छी खासी है, को भी-प्रभावित करने और उन्हें धर्म के नाम पर चीन की मौजूदा कम्युनिस्ट सरकार के विरुद्ध उकसाने में लगे रहते हैं। 1990 में प्रकाशित दलाई लामा की जीवनी ‘फ्रीडम इन इक्जाइल’ में जिस तिब्बत का सपना देखा गया है उसमें पूर्वी तुर्किस्तान और मध्य मंगोलिया से लेकर उत्तर-पूर्वी चीन और मंचूरिया तक के हिस्से शामिल हैं। इसे चीन अपनी भौगोलिक अखंडता को तोड़ने की साजिश के रूप में प्रचारित करता है।
तिब्बत को मिल रहे अंतराष्ट्रीय समर्थन से उत्सहित होकर चीन के उत्तर-पश्चिमी हिस्से खासकर सिकियांग प्रांत के इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी अपने लिए अधिक स्वायत्तता और आजादी की मांग तेज कर दी है। कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं में आमतौर पर यह शिकायत रहती है कि वहां ‘एकरूपता’ पर ज्यादा जोर रहता है और ‘विभिन्नताओं’ का सम्मान नहीं किया जाता।
सोवियत संघ के बिखराव का यह एक बड़ा कारण रहा है जिससे लगता है कि चीन ने कोई सबक नहीं सीखा है। यही वजह है कि ‘महाबली’ का दर्जा हासिल कर चुके चीन को मुट्ठीभर आंदोलनकारियों से भी डरना पड़ रहा है। ऐसे चीन के आचरण में न हमारी सरकार को कोई आपत्तिजनक चीज दिखाई पड़ती है और न सरकार को समर्थन देने वाली कम्युनिस्ट पार्टियों को।
हमारे विदेशमंत्री दलाई लामा और उनके समर्थकों को चेता रहे हैं और माकपा महासचिव तिब्बत की तुलना जम्मू-कश्मीर और नगालैंड से करने की हद तक पहुंच चुके हैं। लेकिन इन लोगों ने कभी भी नगालैंड, मिजोरम और मणिपुर में चल रहे खूनी संघर्ष की आलोचना नहीं की। जरा सी बात पर बीजिंग में हमारे राजदूत को आधी रात में तलब करके विरोध दर्ज कराया जाता है, पर नई दिल्ली में चीन के राजदूत यह कहते हैं कि अरुणाचल प्रदेश चीन का अभिन्न अंग है।
चीन सरकार के हर नक्शे में अरुणाचल को एक चीनी प्रांत के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। समूचे दक्षिण एशिया में पाकिस्तान समेत जिस किसी भी देश से हमारा मनमुटाव होता है, उसकी मदद करने के लिए चीन सहर्ष पहुंच जाता है। नेहरूजी ने भी शुरू में चीन से बड़ी दोस्ती गांठने की कोशिश की थी, लेकिन बाद में चीन के साथ हुए युद्ध (1962) से नेहरू बहुत गहरे तक व्यथित हुए। आज उन्हीं की पार्टी की सरकार जब तिब्बत मामले में चीन की हिमायती भाषा बोल रही है, तो लगता है कि जैसे उसने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा।