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खुराना की घरवापसी

संपादकीय. भारतीय जनता पार्टी के लिए मुद्दे और नेता बहुत ज्यादा कभी नहीं बदलते। समय की जरूरत और अपेक्षा को देखते हुए पार्टी महत्वपूर्ण मौकों पर अपने आजमाए हुए मुद्दों और चेहरों पर ही विश्वास करती है। दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री रहे दिग्गज भाजपा नेता मदनलाल खुराना की पार्टी में वापसी के प्रमुख कारणों में एक यह भी है। दो वर्ष पहले उन्होंने कंधार मामले में लालकृष्ण आडवाणी की तीखी आलोचना करते हुए पार्टी छोड़ दी थी।

यह भी संयोग है कि अब, जब खुराना ने उन टिप्पणियों पर खेद जताते हुए पार्टी में वापसी की है, तो वही आडवाणी भाजपा के शीर्ष प्रमुख के रूप में स्थापित हैं। खुराना भी एक समय आडवाणी को अपना आदर्श मानते थे। पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने कुछ समय तक उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी का दामन थामा था, पर जल्दी ही खुराना का उससे भी मोहभंग हो गया।

खुराना की वापसी को दिल्ली में भाजपा को मजबूत करने की दिशा में उठाया गया कदम कहा जा रहा है। इस साल के अंत तक दिल्ली विधानसभा के चुनाव होने हैं और वहां पंजाबी समुदाय के बीच लोकप्रिय रहे खुराना न केवल दिल्ली की गली-मोहल्लों की समस्याओं से बखूबी वाकिफ हैं, बल्कि उन मामलों को जोर-शोर से उठाने में भी माहिर हैं। दिल्ली में दस वर्षो से सत्ता में काबिज कांग्रेस पार्टी और वहां की मुख्यमंत्री के लिए यह एक नई चुनौती है, क्योंकि दिल्ली के बढ़ते शहरीकरण से जुड़ी समस्याओं और 2010 के राष्ट्रकुल खेलों के चलते दिल्ली सरकार पहले से ही दबाव में है।

खुराना का प्रभाव मुख्यत: दिल्ली तक सीमित है और दिल्ली विधानसभा चुनाव के कुछ महीने पहले वे भाजपा में वापस आए। यह प्रकरण उत्तरप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी की याद दिलाता है। वे भी उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के ठीक पहले ही पार्टी में वापस आए थे। इस साल के अंत तक कई अन्य राज्यों में भी विधानसभा चुनाव होने हैं।

आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर कुछ और नेता इस तरह अपनी मूल पार्टी में वापसी कर लें। एक राष्ट्रीय स्तर के ढांचे और जनाधार के अभाव में किसी भी जुझारू नेता के लिए आज की राजनीति में प्रभाव छोड़ना ज्यादा संभव नहीं है। खुराना अगर समझते हैं कि वे देश की राजनीति में अभी भी कुछ योगदान कर सकते हैं, तो उनके सामने घरवापसी के अलावा ज्यादा विकल्प थे भी नहीं।





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