जयपुर.
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी ने सरिस्का अभयारण्य को फिर से बाघों से आबाद करने के लिए हरी झंडी दे दी है। यहां रणथंभौर अभयारण्य से बाघ लाकर छोड़े जाएंगे। अगले महीने से सरिस्का में बाघ की दहाड़ सुनाई देने लगेगी। अभी यहां एक भी बाघ नहीं है। केंद्र ने परियोजना के लिए फिलहाल 30 लाख रु. स्वीकृत किए हैं।
राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक अभिजीत घोष का दावा है कि टाइगर के मामले में दुनिया में पहली बार उजड़े अभयारण्य को आबाद करने का प्रयोग किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सरिस्का में बाघों के पुनर्वास के लिए 1 करोड़ 54 लाख रुपए की परियोजना केंद्र सरकार को भेजी गई थी।
पहले चरण में स्वीकृत हुए 30 लाख रुपए की लागत से सरिस्का में 8 से 10 हेक्टेयर में सॉफ्ट एनक्लोजर एवं कॉरीडोर बनाया जाएगा। एनक्लोजर में पहले चरण में रणथंभौर से एक बाघिन लाकर छोड़ी जाएगी। इसकी उम्र 4 से 6 साल के बीच होगी। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक आर.एन. मेहरोत्रा के अनुसार सरिस्का में बाघ छोड़ने की परियोजना को केंद्र सरकार ने इसी 31 मार्च को मंजूरी दी है।
मंजूरी के बाद मेहरोत्रा एक व दो अप्रैल को दिल्ली जाकर नेशनल टाइगर कंजरवेटर अथॉरिटी के अधिकारियों से मिले और बाघों को रणथंभौर से सरिस्का ले जाने के बारे में विचार-विमर्श किया। मेहरोत्रा के अनुसार अगले एक महीने में सरिस्का में बाघिन ले जाकर छोड़ दी जाएगी। इसकी तैयारी शुरू कर दी गई है।
तीन चरणों में आबाद होगा सरिस्का
सरिस्का अभयारण्य में तीन चरणों में बाघ छोड़े जाएंगे। पहले चरण में छोड़ी गई बाघिन करीब दो माह तक अकेली रहेगी। दूसरे चरण में रणथंभौर अभयारण्य से ले जाकर एक बाघ छोड़ा जाएगा। तीसरे चरण में रणथंभौर से ही दूसरी बाघिन ले जाकर वहां छोड़ी जाएगी। तीनों चरण इस साल पूरे हो जाएंगे। रणथंभौर से ले जाकर छोड़े जाने वाले बाघ एवं बाघिनों को चिह्न्ति कर लिया गया है।
लगातार रहेगी नजर
सरिस्का में छोड़े जाने वाले बाघों की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे नजर रखी जाएगी। इसके लिए बाघिन एवं बाघ के शरीर में सैटेलाइट रेडियो कॉलर लगाए जाएंगे। तीनों बाघों के सरिस्का में पूरी तरह रच-बस जाने तक वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून के वन्यजीव विशेषज्ञ वहां लगातार कैंप करेंगे।