जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में व्यवस्था दी है कि प्रदेश में मुकदमों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के क्लॉज (2) के अनुसार कॉज ऑफ एक्शन से तय हो, न कि जिले से।
न्यायाधीश आर.एम.लोढ़ा एवं आर.एस. राठौड़ की खंड पीठ ने बृज किशोर गुप्ता की ओर से दायर विशेष अपील का निपटारा करते हुए जोधपुर व जयपुर पीठ में मुकदमों की सुनवाई के संबंध में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश द्वारा 23 दिसंबर 1976 को जारी की गई उस अधिसूचना को अवैधानिक करार दिया, जिसके तहत जोधपुर व जयपुर के बीच मुकदमों की सुनवाई का क्षेत्राधिकार निर्धारित किया गया था।
अदालत ने कहा कि तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार नहीं था कि वे मुकदमों की सुनवाई के लिए जोधपुर को 14 व जयपुर पीठ को 16 जिलों में विभाजित कर रिट याचिका व अपील पेश करने के क्षेत्राधिकार का निर्धारण करते।
क्या है मामला
बृजकिशोर श्रीगंगानगर शुगर मिल में डिप्टी चीफ केमिस्ट के पद पर कार्यरत है और उससे पिछले 16 साल से तदर्थ आधार पर चीफ केमिस्ट के पद का काम लिया जा रहा है। बृजकिशोर ने खुद को चीफ केमिस्ट के पद पर नियमित नहीं किए जाने को लेकर अदालत में दायर रिट याचिका में कहा था कि उसे चीफ केमिस्ट के पद पर नियमित करके 1992 से इस पद का वेतन लाभ दिलवाया जाए। एकलपीठ ने उसकी याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि श्रीगंगानगर जोधपुर हाईकोर्ट के क्षेत्राधिकार में आता है, इसलिए याचिका वहीं पेश की जाए।
एकलपीठ के आदेश को बृजकिशोर ने खंडपीठ में चुनौती दी। मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता शिवचरण गुप्ता ने दलील दी कि श्रीगंगानगर शुगर मिल का प्रशासनिक ऑफिस जयपुर में है, इसलिए विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक जयपुर में ही होती है और पदोन्नति के आदेश भी यहीं से जारी होते हैं। श्रीगंगानगर से इस बारे में कोई कार्यवाही नहीं होनी है। इस पर अदालत ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की उस अधिसूचना को अवैधानिक माना जिसमें कि मुकदमों की सुनवाई को जिलेवार निर्धारित किया गया था।