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जनभागीदारी से विकसित होंगी सड़कें

इंदौर. जनभागीदारी से सीमेंटेड गलियां बनाकर क्रिसिल अवॉर्ड जीतने और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के आधार पर सिटी बस चलाकर राष्ट्रीय स्तर पर सराहना पाने वाला इंदौर इसी तर्ज पर विकास की एक और इबारत लिखने जा रहा है। जल्दी ही यहां मास्टर प्लान की सड़कें भी पीपीपी मॉडल पर विकसित की जाएंगी। इससे शहर का वह हिस्सा तेजी से विकसित होगा जो मास्टर प्लान के निवेश क्षेत्र (प्लानिंग एरिया) में तो है लेकिन न नगर निगम के दायरे में आता है न प्राधिकरण की किसी स्कीम में।

इंदौर का मास्टर प्लान क्रियान्वित करने के तरीकों पर विचार के दौरान यह महसूस किया गया कि सरकारी एजेंसियां सारे काम तय सीमा में नहीं कर सकती। इसके चलते कलेक्टर विवेक अग्रवाल ने निजी क्षेत्र को जोड़ने की भी पहल की। यह पाया गया कि शहर के आसपास खासतौर पर रिंगरोड व बायपास के बीच ऐसा बहुत सा इलाका है जो रोड नेटवर्क नहीं होने से पर्याप्त विकसित नहीं हो पाया। लोग वहां बस गए जहां रिंगरोड या बायपास जैसी व्यवस्थित सड़कें पहुंचीं। यह भी माना गया कि मास्टर प्लान के पूरे क्षेत्र में प्राधिकरण स्कीम नहीं ला सकता।

तो फिर कैसे हो काम

प्रारंभिक तौर पर यह तय किया गया है कि मास्टर प्लान में प्रस्तावित 75 से 18 मीटर चौड़ी सड़कों (जिन्हें मास्टर प्लान रोड कहा जाता है) को राजस्व विभाग से चिह्न्ति कराया जाए। साथ में उस रोड के आसपास डलने वाली पानी, सीवरेज, ड्रेनेज लाइन आदि का भी पूरा खाका तैयार हो। इस दायरे में आने वाली सरकारी जमीन तो सड़क के काम आ ही जाएगी और निजी जमीनों के लिए उनके मालिकों से सहमति ली जाए।

लगेगी आसपास वालों की मदद

ऐसी रोड के आसपास जिनकी जमीनें होंगी उनसे पैसा लेकर वह रोड बना दी जाएगी। उसमें ड्रेनेज व पानी की लाइन जैसे प्रावधान भविष्य की जरूरतों के मुताबिक रहेंगे। निर्माण इंदौर विकास प्राधिकरण, नगर निगम, लोक निर्माण विभाग जैसी किसी भी एजेंसी के माध्यम से या उनके सुपरविजन में कराया जा सकेगा। इससे जमीन मालिकों में कहीं स्कीम न आ जाए का डर भी खत्म होगा।

जिला योजना समिति में भी पारित

कलेक्टर बताते हैं इसके लिए जिला योजना समिति में भी प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। इसे लागू करने के लिए जल्दी ही विस्तृत योजना बना ली जाएगी। उम्मीद है इससे मास्टर प्लान की सड़कें तीन-चार साल में ही बन जाएंगी। सड़कों का जाल इस तरह बिछाया जाएगा कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा मिले और पैदल चलने वालों या साइकिल चालकों को भी सुरक्षित लेन मिले।

जरूरत 15 हजार करोड़ की

मास्टर प्लान कमेटी के सदस्य आर्किटेक्ट हितेंद्र मेहता बताते हैं मास्टर प्लान की सड़कें बनाने के लिए 15 हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। 1976-91 का मास्टर प्लान जब बना था तब प्लानिंग एरिया में 390 हेक्टेयर जमीन ट्रैफिक व ट्रांसपोर्टेशन के उपयोग में आ रही थी। इस उद्देश्य में सड़कों के साथ ट्रांसपोर्टनगर आदि भी आते हैं। प्लान में इस उद्देश्य से 1700 हेक्टेयर जमीन रखी गई थी लेकिन विकसित हुई 1370 हेक्टेयर ही।

मास्टर प्लान-2021 में इसे बढ़ाकर 5605 हेक्टेयर कर दिया गया। इंदौर में फिलहाल 1050 किलोमीटर सड़कें (गलियां छोड़कर) हैं, जो 2021 तक 2100 किलोमीटर की जाना हैं। लगभग एक हजार किलोमीटर सड़कों की दो लेन बनाने के लिए 15 हजार करोड़ लगेंगे। प्लानिंग एरिया में 15 हजार हेक्टेयर क्षेत्र विकास के लिए उपलब्ध है। ऐसी जमीनों के मालिकों से प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक महज दस रुपए वर्गफीट लेकर यह राशि जुटाना और सड़कों का जाल बिछाना मुश्किल नहीं। प्रारंभिक अनुमान के मुताबिक 30 मीटर से ज्यादा चौड़ी 300 किलोमीटर सड़कें तत्काल इस तरह बनाई जा सकती हैं।





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