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Madhya Pradesh
Gwalior Gwalior ग्वालियर. मध्य प्रदेश सरकार ने विवाह पंजीयन का काम अब नगर निगम को सौंप दिया है। नगर निगम सीमा क्षेत्र के बाहर यह काम वे संस्थाएं करेंगी जो कि जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र देने का काम कर रही हैं। उल्लेखनीय है कि इस समय एडीएम कार्यालय में मप्र हिन्दु विवाह रजिस्ट्रीकरण नियम 1984 व विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत ही विवाह पंजीयन किए जाते हैं।
एडीएम कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार राज्य शासन ने मध्य प्रदेश विवाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण नियम 2008 तैयार किया है। इस नियम को बनाने से पहले सरकार ने 29 दिसंबर तक प्रदेश के सभी जिलों से आपत्तियां मांगी थी। इसके बाद 23 जनवरी 2008 को विधि और विधायी कार्य विभाग ने उक्त नियम को राजपत्र में प्रकाशित कर अधिसूचित कर दिया। इस नियम के लागू होने के बाद राज्य के भीतर ऐसे विवाहों को प्रशासित करने वाली किसी विधि या रूढ़ि के अधीन, भारत के नागरिकों के बीच अनुष्ठापित या संविदाकृत प्रत्येक विवाह अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रीकृत किया जाएगा।
विवाहों के रजिस्ट्रेशन के लिए शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में फिलहाल वे अधिकारी अधिकृत होंगे जो कि जन्म मृत्यु पंजीयन (स्थानीय निकाय) के लिए सक्षम हैं। राज्य शासन द्वारा जब तक विवाह रजिस्ट्रार की नियुक्ति नहीं कर दी जाती है तब तक यह काम उपरोक्त अधिकारी द्वारा ही किया जाता रहेगा।
सबूत होगा पंजीयन
इन नियमों के लागू होने पर किसी विधि या रूढ़ि के अधीन अनुष्ठापित तथा संविदाकृत विवाह और इन नियमों के उपबंधों के अधीन रजिस्ट्रीकृत न किए गए विवाह, विवाह के निश्चायक सबूत नहीं माने जाएंगे। इससे साफ है कि अब पति-पत्नी के बीच के किसी भी मामले में उक्त पंजीयन आवश्यक होगा।
आवेदन करना पड़ेगा
इस नियम के बनने के बाद कोई भी व्यक्ति निर्धारित प्रारूप में विवाह पंजीयन के लिए विवाह होने के एक माह तक की अवधि में दो प्रतियों में आवेदन कर सकेगा। यदि समक्ष में आवेदन करना संभव न हो तो विवाह रजिस्ट्रार को पंजीकृत डाक से भी आवेदन किया जा सकेगा। आवेदन के साथ फीस के रूप में तीस रुपए भी देने होंगे।
निराकरण दो माह में
विवाह रजिस्ट्रार आवेदन प्राप्त होने पर अधिकतम दो माह में विवाह पंजीयन प्रमाण-पत्र जारी करेंगे। यदि किसी कारणवश पंजीयन संभव न हो तो इसकी सूचना आवेदक को देनी होगी। इसके बाद आवेदक तीस दिन की समय सीमा में जिला न्यायाधीश को आवेदन कर अपील कर सकेगा।
कोर्ट के आदेश पर अमल
राज्य शासन ने उक्त नियम सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश के पालन में बनाया है। बताया जाता है कि सुप्रीम कोर्ट ने अंतरण याचिका सीमा विरुद्ध अश्वनी कुमार में 14 फरवरी 2006 को तथा 25 अक्टूबर 2007 को राज्य शासन को समस्त विवाहों का अनिवार्य पंजीयन करने के लिए नियम विरचित करने के निर्देश दिए थे।