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वो किसी की आंख का नूर है..

चंडीगढ़.‘हिरनी जैसी आंखों वाली हमारी बिटिया अब किसी की आंखों में बसती है। वो तो महज साढ़े तीन साल में ही हमें छोड़ गई लेकिन उसकी आंखें अपनी उम्र जी सकेंगी।’ बेटी विधि को याद कर पटियाला के यशपाल राजपाल व ज्योति की आंखें नम हो जाती हैं लेकिन उनमें चमक होती है..कुछ बड़ा कर गुजरने की चमक।

यशपाल बताते हैं, ‘विधि पैदा होने के साथ ही बीमार रहने लगी थी, उसे अक्सर निमोनिया हो जाता था। डॉक्टरों को दिखाया लेकिन सभी के इलाज बेअसर रहे। 1 अक्टूबर 2006 को पीजीआई के पीडियाट्रिक डिपार्टमेंट में एडमिट करवाया गया। टेस्ट से पता चला कि आखिरी स्टेज का लीवर कैंसर है। उसे बचाया नहीं जा सका और पिछले साल 13 अक्टूबर को उसने हमेशा के लिए आंखें मूंद ली।

भर आईं आंखों से यशपाल ने आगे बताया, ‘विधि की मौत का यकीन करना हम सभी के लिए बहुत मुश्किल था। मेरे मां-बाप उस पर जान छिड़कते थे। उन्हीं की इच्छा थी कि विधि की आंखें दान कर दी जाए ताकि वो किसी की आंखों में जिंदा रहे। हम भी इस बात पर राजी थे और पीजीआई के आई बैंक में उसकी आंखें दान कर दीं।’

बच्चों की आंखें ज्यादा मुफीद

पीजीआई के ऑप्थेल्मोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉ. अमित गुप्ता बताते हैं, हमारी आंखों में होने वाला एंडोथीलियम कॉर्निया (पुतलियों) को साफ रखता है। एंडोथीलियम में जितने ज्यादा सेल होंगे, कॉर्निया उतने ही फ्रेश होते हैं। बच्चों के एंडोथीलियम में ज्यादा सेल होने से उनके कॉर्निया (पुतली) बहुत साफ और बेहतर होते हैं। इसी कारण छोटे बच्चों का कॉर्निया बहुत ही चैलेंजिंग केस में यूज किया जाता है। ज्यादातर यंगस्टर्स कॉर्नियल ट्रांसप्लांट के लिए बच्चों की आंखें डिमांड करते हैं।

कॉर्नियल ट्रांसप्लांट पर खर्च कॉर्नियल ट्रांसप्लांट पर जीएमसीएच-32 में चार से पांच हजार रुपए और पीजीआई में सात से आठ हजार तक खर्च आता है। प्राइवेट हॉस्पिटल में ये खर्च 40 से 50 हजार तक पड़ता है।





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Amit Sharma
Sunday, 6th Apr 2008, 1:04
यह काफी अच्छा तरीका है किसी को आंखों के जरिये जीवित रखने का । काश हमें भी यह पहले सूझा होता तो आज हमारी अकांक्षा भी किसी की आंखों में जीवित होती।