खंडवा.
जिले के ओंकारेश्वर बांध के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मप्र सरकार को आदेश दिया कि वह 15 अप्रैल तक विस्थापितों को दी जाने वाली जमीन का विवरण कोर्ट में प्रस्तुत करे। मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन व न्यायाधीश आर.वी. रवींद्रन की खंडपीठ के सामने सरकार ने स्वीकार किया कि वह हाईकोर्ट के निर्देशानुसार विस्थापितों को जमीन देगी।
जमीन का विवरण प्रस्तुत किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 21 अप्रैल को होगी।नर्मदा बचाओ आंदोलन की याचिका पर आदेश देते हुए मप्र हाई कोर्ट ने 21 फरवरी को प्रभावितों एवं उनके वयस्क पुत्रों को जमीन के बदले जमीन देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार व नर्मदा हाइड्रो इलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कॉपरेरेशन (एनएचडीसी) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
सोमवार की सुनवाई में कोर्ट ने माना कि विस्थापितों को जमीन दी जाना जरूरी है ताकि वे बेहतर ढंग से जीवनयापन कर सकें। खंडपीठ ने यह भी कहा कि जब परियोजना की सहमति लेते समय जमीन देने की बात की गई थी तो अब सरकार अपने वादे से मुकर नहीं सकती। इस पर सरकार की तरफ से कहा गया हमारे पास पांच हजार हेक्टेयर जमीन है और विस्थापितों को जमीन देने के लिए तैयार हैं।
मैदानी हकीकत : पुनर्वास के लिए चाहिए 8000 हेक्टेयर >>
ओंकारेश्वर बांध में खंडवा जिले के 21 और देवास जिले के नौ गांवों के लगभग दस हजार परिवार प्रभावित हो रहे हैं। इन्हें लगभग आठ हजार हेक्टेयर जमीन दी जाना है।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने अवश्य मान लिया कि हमारे पास पांच हजार हेक्टेयर जमीन है लेकिन मैदानी हकीकत कुछ और है। खंडवा जिले में उपलब्ध अधिकांश सरकारी जमीन उपजाऊ नहीं है। किसान शायद ही सरकार को निजी जमीन बेचेंगे। 2005 में सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट कर चुकी है कि विस्थापित किसानों को खेती लायक सिंचित ही जमीन उपलब्ध कराना है।
लगभग आठ हजार हेक्टेयर जमीन मिलना बहुत मुश्किल है और भिंड, मुरैना या प्रदेश के अन्य हिस्सों में यहां के किसान जमीन लेने को तैयार नहीं होंगे। ऐसे में अब 15 अप्रैल का इंतजार किया जाएगा कि सरकार अपने पास उपलब्ध जमीन का क्या विवरण सुप्रीम कोर्ट में उपलब्ध कराती है। इसके बाद ही नर्मदा बचाओ आंदोलन भी अपना रूख स्पष्ट करेगा।
हाई कोर्ट ने पहले ही आदेश दिया है कि जब तक सभी विस्थापितों का पूरा पुनर्वास नहीं हो जाता तब तक बांध का जल स्तर १८९ मीटर से अधिक नहीं ले जाया सकता।इस जल स्तर पर पूरी क्षमता से बिजली उत्पादन संभव नहीं है। ऐसे में सरकार को विधानसभा चुनाव से पहले इस मामले को हल करना जरूरी होगा। जानकारों के अनुसार पूरी संभावना है कि सरकार पांच हेक्टेयर जमीन के बदले नकद मुआवजा लेने का विकल्प विस्थापितों के समक्ष रखे और इसे मान लिया जाए। यह अलग बात है कि कागजी खानापूर्ति के लिए खंडवा में सरकारी जमीन की जानकारी इकट्ठा की जा रही है।