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नारियल से बनेगा बायोलूब्रिकेंट

जगदलपुर. narialशहीद गुंडाधूर कृषि महाविद्यालय व अनुसंधान केंद्र कुम्हरावंड ने 20 साल तक चले रिसर्च के बाद नारियल की नई किस्म तैयार की है, जिसका उत्पादन राष्ट्रीय औसत से दुगुना है। कालेज के डीन डा. एसके पाटिल ने बताया कि केरल और तमिलनाडू की तर्ज पर बस्तर में भी नारियल तेल की वसा से बायोलूब्रिकेंट बनाने का प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है।

नारियल की नई प्रजाति को केरा-बस्तर नाम दिया गया है। इसके एक पेड़ से हर महीने 70 से 100 फल मिलते हैं, जबकि एक पेड़ से नारियल का राष्ट्रीय औसत सिर्फ 40 फल है। गुरुवार को यहां आयोजित किसान सम्मेलन में मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने केरा बस्तर किस्म जारी की। आमतौर पर नारियल में 65.7 प्रतिशत खाद्य तेल, 145 ग्राम खोपरा व त्वचा और चयापचय के लिए आवश्यक लारिक एसिड पाया जाता है।

डा. पाटिल का कहना है कि नारियल भविष्य के लिए लुब्रिकेंट का बेहतर स्रोत हो सकता है। नारियल की नई किस्म तैयार करने के प्रोजेक्ट में पिछले तीन साल से जुड़े हार्टिकल्चरिस्ट एलएस वर्मा ने बताया कि प्रोजेक्ट में कासरगोड (केरल) स्थित सेंट्रल प्लांटेशन क्र ाप रिसर्च इंस्टीटच्यूट से काफी मदद मिली। 4-5 साल के अंदर बस्तर इस नई वेराइटी का व्यावसायिक उत्पादन करने में सफल हो जाएगा। इसमें सबसे बड़ी मुश्किल बस्तर के किसान की मानसिकता है। नारियल की अच्छी खपत, उपयुक्त जलवायु और आसान फंडिंग के बावजूद बस्तर के किसान नारियल की खेती नहीं करना चाहते। नारियल उत्पादन की संभावना को देखते हुए कोंडागांव में प्रदेश का एकमात्र नारियल विकास बोर्ड शुरू किया गया था। मुख्य फसल से उत्पादन मिलने में 8 से 10 साल का समय लग जाता है। इससे किसान उकता जाते हैं।

पेड़ तैयार होने के बाद सल्फी की तरह 100 से 150 साल तक आजीविका का अच्छा साधन बन सकता है। एग्रोनामिस्ट एके ठाकुर का कहना है कि नारियल के पेड़ों के बीच दूसरी फसलें लेकर अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। अकेले जगदलपुर शहर में ही रोजाना 18 हजार से अधिक नारियल खप जाते हैं। महीने भर में लगभग 30 से 40 ट्रक माल यहां आता है।

केरा-बस्तर अपरंपरागत क्षेत्र से निकाली गई नारियल की पहली किस्म है, जो बस्तर को देश में पहचान देगी। शीघ्र ही नारियल पानी के लिए भी नई प्रजाति विकसित कर ली जाएगी। इस दिशा में प्रयास जारी है।
—डा. सीआर हाजरा, कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर





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