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खुदाई में मिला शस्त्रों का भंडार

रायपुर. कवर्धा इलाके के जंगली क्षेत्र सिलीपचराही में पुरात्व विभाग को खुदाई के दौरान समूचा शस्त्रागार मिला। यहां लोहे का खंजर, जंजीर वाली हथकड़ी और कुल्हाड़ी समेत दर्जनभर प्राचीन हथियार रखे हुए थे। पुरात्वविदों के मुताबिक हथियार कल्चुरी शासनकाल के हो सकते हैं। गौरतलब है, यहीं पर खुदाई में नागवंशी काल के सोने-चांदी के दुर्लभ सिक्के बरामद हो चुके हैं।

हथियारों का जखीरा सतह से एक मीटर की गहराई में दफन था। लोहे के हथियारों के इर्दगिर्द मिट्टी की मोटी परत हटाते ही पूरा शस्त्रागार निकल कर सामने आ गया। इन्हें देखकर उत्खनन कर रहे विशेषज्ञों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। आगे की जांच के लिए इन्हें संरक्षित कर लिया गया है। हथियारों पर काफी जंग लगी चुकी थी, उसे उपचारित कर साफ किया गया। उच्च श्रेणी के लोहे से निर्मित औजार आज भी अपने मूल स्वरूप में हैं। ताले वाली हथकड़ियां के साथ सात फीट जंजीर जुड़ी हुई है। मुठवाला खंजर 10 इंच से ज्यादा लंबा है।

उत्खनन के निदेशक डा. एसएस यादव का कहना है कि जिस जगह से हथियार मिले हैं, वहां कोई शस्त्रागार अथवा बंदी गृह रहा होगा, जो सभ्यता के पतन के साथ ही नष्ट हुआ होगा। पुराविद अब इस अवधारणा की पुष्टि के लिए प्रमाण जुटाने की कोशिश में जुट गए हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि जिस जगह पर हथियारों का जखीरा मिला है, वहां किसी बंदी की हत्या की गई होगी। इसलिए एक ही जगह पर हथकड़ी और खंजर मिला है। वहां किसी शासक का बंदीगृह हो सकता है।

कल्चुरियों की मौजूदगी के संकेत

हाफ नदी घाटी में स्थित सिलीपचराही की खुदाई में मिले ज्यादातर अवशेष फणीनागवंशी शासकों से संबंधित हैं, लेकिन इस बार जो हथियार मिले हैं उनसे पुरात्वविदों को वहां कलचुरियों की मौजूदगी के संकेत मिले हैं। इतिहास की पुस्तकों में भी उल्लेख मिलता है कि उत्तरकालीन नागवंशी शासक कल्चुरियों के प्रतिनिधि हुआ करते थे। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सिलीपचराही प्राग इतिहास से लेकर आधुनिक काल तक आबाद रही। इस उर्वर भूमि पर जीवन के हर पहलू से जुड़ी पुरानिधियां मिलने का सिलसिला जारी है।

पुरातत्व मामलों के जानकार राहुल सिंह ने बताया कि सिक्कों में नागवंशी काल की छाप मिलती है तो हथियारों में कल्चुरियों की उपस्थिति। हथियारों के काल का निर्धारण तो गहन जांच पड़ताल के बाद ही हो पाएगा, लेकिन इनकी बनावट आधुनिक उपकरणों से मिलती-जुलती सी है।

डेढ़ माह से खुदाई

सिलीपचराही में डेढ़ महीने से उत्खनन कर रही विशेषज्ञों की टीम ने अब तक 25 ट्रैंच का लेआउट तैयार किया है। इनमें से 15 में खुदाई का काम तेजी से चल रहा है। प्रत्येक 10 मीटर लंबी और इतनी ही चौड़ी है। यहां से अब तक उमा महेश्वर की प्रतिमा, एक जैन मूर्ति, सिंह की मुखाकृति, मुगलकालीन सिक्के के अलावा यहां से चांदी और सोने के कीमती सिक्के भी मिल चुके हैं। नदी घाटी में कराए गए सर्वे में प्राग इतिहास काल के टूल्स मिले हैं। दावा किया जाता है कि यहां विस्तृत क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पुरानिधियां बिखरी पड़ी हैं।





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