जयपुर. केंद्र सरकार की नई खनिज नीति से खान मालिकों की नींद उड़ी हुई है। उन्हें डर है कि इससे मेजर मिनरल्स के बड़े निवेशकों व बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लाभ होगा और उनका इस क्षेत्र में एकाधिकार हो जाएगा।
खदान मालिकों का मानना है कि नई खनिज नीति में शामिल प्रावधानों से बड़े निवेशकों को ही फायदा होगा। नए प्रावधानों से राज्य में सोपस्टोन, क्वाट्र्ज और फेल्सफार से जुड़े छोटे खनन व्यवसायियों पर विपरीत असर पड़ेगा। इन खनिजों के माध्यम से युवाओं को आसानी से रोजगार मिल रहा है, क्योंकि ये खनिज सतह पर होने के कारण ज्यादा निवेश की जरूरत नहीं पड़ती है।
राज्य सरकार की प्रस्तावित खनिज नीति में भी क्वाट्र्ज और फेल्सफार जैसे खनिजों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मुहैया कराना शामिल है। नई नीति के तहत बड़े निवेशकों को ऐसे खनिजों के बड़े क्षेत्र आबंटित किए जाएंगे, जिससे उनका एकाधिकार हो जाएगा। इन खनिजों का उपयोग टाइल्स निर्माण, खाद और केमिकल इंडस्ट्री में होता है। नई नीति में पंचायत, भूउपयोग परिवर्तन, वन एवं पर्यावरण आदि विभागों में तालमेल को लेकर कोई कदम नहीं उठाया गया है।
एम्पावर्ड कमेटी करेगी निगरानी
नई खनिज नीति के तहत राज्यों में खनिजों की खोज और खनन पट्टों के लिए होने वाली कार्रवाई पर एम्पावर्ड कमेटी निगरानी रखेगी। सभी राज्यों में प्रदेश स्तर पर व केंद्रीय स्तर पर एम्पावर्ड कमेटी का गठन किया जाएगा। केंद्रीय खान सचिव जे.पी.सिंह के अनुसार खनिजों के पूर्वेक्षण और सर्वेक्षण, खनन पट्टे लेने में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए आवेदक एम्पावर्ड कमेटी से मदद ले सकेगा।
केंद्रीय स्तर पर आ रही अड़चनों को दूर करने में सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी से संपर्क किया जाएगा। ये कमेटियां राज्य और केंद्रीय स्तर पर समन्वय भी करेंगी। नई खनिज नीति के तहत केंद्रीय स्तर पर प्राधिकरण का गठन किया जाएगा। निर्धारित समय सीमा में आवेदन पत्रों का निस्तारण नहीं होने पर मामला प्राधिकरण के पास चला जाएगा। वर्तमान में इन मामलों की सुनवाई केंद्रीय खान मंत्रालय में सक्षम अधिकारी द्वारा की जाती है।
इनका कहना है >>
नई खनिज नीति में जो प्रावधान किए गए हैं, उससे बड़े निवेशकों को ज्यादा फायदा होगा। बड़े निवेशक तो वन एवं पर्यावरण विभागों से आसानी से अनापत्ति प्रमाण पत्र ले लेंगे, लेकिन छोटे निवेशकों का वहां तक पहुंचना बहुत मुश्किल होगा। इससे 90 प्रतिशत छोटे व्यवसायियों को यह क्षेत्र छोड़ना पड़ेगा।
—एम.एल.लुणावत, सदस्य, फेडरेशन ऑफ इंडियन माइनिंग एसोसिएशन
नई खनिज नीति से मल्टीनेशनल कंपनियों को लाभ मिलेगा। वर्तमान में भी कच्चे माल की समस्या है जो बाद में और बढ़ जाएगी। राज्य का मिनरल्स यहां प्रोसेस होने की बजाय अन्य राज्यों में निर्यात किया जाएगा, जिससे राज्य को नुकसान होगा।
>—गुरप्रीतसिंह सोनी, अध्यक्ष, इंडियन सोपस्टोन प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन
ऐसे प्रावधान से राजस्थान जैसे औद्योगिक रूप से पिछड़े राज्य में निवेश भी प्रभावित होगा। इसी प्रकार पूर्वेक्षण अनुज्ञा पत्र के क्षेत्र को बढ़ाना भी एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति को प्रश्रय देना है। आवेदन पत्रों के लिए समय सीमा तय करना भी विकेंद्रीकरण की मूल भावना के विपरीत है।
>—लक्ष्मीनारायण दवे, खान मंत्री, राजस्थान