दृष्टिकोण टैगोर ने ऐसी बात कही, जिसे हमें जरूर याद रखना चाहिए। मुझे उनके कहे शब्द ठीक-ठीक तो याद नहीं हैं, लेकिन उनका सार बहुत सहज था। उन्होंने कहा था- ‘मैंने पूरी दुनिया घूमी है और इस दौरान तकरीबन सभी शानदार चीजें देख चुका हूं। लेकिन मैं अकसर अपने ही घर के बाहर उगी घास के तिनकों पर जमी ओस की बूंदों से उपजे अप्रतिम सौंदर्य को नहीं पढ़ पाया।’ यह बात सिर्फ सौंदर्य ही नहीं, प्यार पर भी लागू होती है।
आप जिस प्यार की कल्पना करते हैं, उसे पाने के लिए जी-तोड़ कोशिश करते हैं। और न मिलने पर जब आप हार मानकर बैठ जाते हैं, तो आप पाते हैं कि यह हमेशा आपके पास था, पर आप कभी इसे देख नहीं सके। वास्तव में जीवन की ज्यादातर चीजें वहां हमेशा से थीं। हमें सिर्फ उन पर ध्यान देना होगा, फिर हालात अपने आप सुधर जाएंगे।
मुद्रास्फीति से जूझती हमारी सरकार ने अचानक सोते से जागते हुए इसे जनता का दुश्मन नं. 1 करार दिया है। एक चुनावी साल में यह कोई असहज बात भी नहीं है। मुद्रास्फीति से लड़ने के तमाम औजार बाहर निकाल लिए गए हैं और वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि मुद्रास्फीति को काबू में करने के लिए अगर हमारी विकास दर घटती है तो घट जाए, वे यह भी करने के लिए तैयार हैं। लेकिन साधारण सी सचाई यही है- सरकार खुद इस मुद्रास्फीति के लिए जिम्मेदार है।
कीमतें तीन चीजों की वजह से बढ़ती हैं- भ्रष्टाचार, अनावश्यक अनाप-शनाप खर्च और करों में बढ़ोतरी। इन तीनों कारकों को सरकार बढ़ावा दे रही है।
भ्रष्टाचार से शुरुआत करते हैं। भ्रष्टाचार का मतलब है कि हर चीज की एक छुपी कीमत होती है। इसकी शुरुआत होती है सरकारी अधिकारियों से, जिनकी गिनती संभवत: देश के सबसे अमीर लोगों में होती है। यद्यपि आपका कभी इस ओर ध्यान नहीं जाता, क्योंकि उनकी ज्यादातर दौलत नकदी में या बेनामी संपत्ति के रूप में होती है।
एकाध बार यह बाहर निकलती है जब उनमें से किसी-किसी की कमाई इतनी उतराने लगती है कि सीबीआई उन्हें अपने शिकंजे में ले लेती है। अब सवाल यह है कि सरकार इसे रोकने के लिए क्या करती है?
इसने सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में वृद्धि के रूप में 30,000 करोड़ रुपए की विशाल राशि देने का फैसला किया है। उन्हें अपने भ्रष्टाचार, आलसीपन और आम नागरिक को परेशान करने के लिए यह सौगात दी गई है।
कई लोगों का यह सोचना है कि इतना पैसा और वह भी उस विशाल धनराशि के अलावा जो वे टेबल के नीचे से कमाते हैं, ने हजारों शासकीय कर्मियों को विलासिता के लिए अनाप-शनाप खर्च हेतु प्रेरित किया है। इससे कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है।
इसके बाद अपव्यय या अनावश्यक खर्चो पर आते हैं। किसी भी चीज पर किया गया अनाप-शनाप खर्च मुद्रास्फीति की चिंगारी को और भड़काता है। सरकार तो इसमें माहिर है ही, विशेषकर तब जबकि चुनाव नजदीक हों। मुझे आत्महत्या करने वाले किसानों से पूरी सहानुभूति है, लेकिन कृषकों की दुर्दशा के लिए राष्ट्र की बैंकिंग प्रणाली में उलट-पलट करना और लोगों को अपने बैंक ऋणों को न चुकाने के लिए प्रेरित करना इसका हल नहीं है।
देश के भीतरी इलाकों में पांव पसारती गरीबी के उन्मूलन के लिए हमें यथार्थवादी और ठोस उपाय तलाशने होंगे। सिर्फ 60,000 करोड़ रुपए के बैंक लोन माफ करना इस समस्या का हल नहीं है जबकि आप भलीभांति जानते हैं कि गरीब किसानों को कभी भी बैंक लोन आसानी से नहीं मिलता। वे तो महाजनों के कर्जदार हैं, इसलिए बैंक ऋणों को माफ करने से उनकी समस्याएं हल नहीं होंगी।
इससे सिर्फ बिचौलियों और दीन-हीन किसानों के वेष में बैठे स्थानीय पार्टी कैडरों को फायदा होगा। यह विशाल धनराशि हमारे सिस्टम में आकर मुद्रास्फीति को और बढ़ाएगी, जिससे कीमतों में उछाल आएगा।
अब करों की बात करें। पिछले कुछ सालों से कर ढांचे के पुनर्गठन के नाम पर सरकार ने तकरीबन सभी उत्पादों व सेवाओं की लागत बढ़ा दी है। आपके और हमारे द्वारा खर्च किए गए हर तीन रुपए में से एक रुपया सरकार की जेब में जाता है। आपके और हमारे द्वारा कमाए गए हर तीन रुपए में से भी एक रुपया सरकारी खजाने में जाता है।
सभी उत्पाद, समस्त सेवाओं में करों का विशाल घटक मौजूद है, जिनके ऊपर हमें इन्हें खरीदने या किराए पर लेने के लिए कर चुकाना पड़ता है। हालिया करों के चलते किराए असहनीय हो गए हैं, हमारा बिजली का बिल दोगुना हो गया है, पानी की लागत बढ़ गई है और यहां तक कि एक उडुपी शॉप में भी बचकाना करों को चुकाए बिना कुछ खा पाना दुश्वार हो गया है। आप किसी अनुबंध पर स्टांप ड्यूटी, प्रोफेशनल टैक्स, इनकम टैक्स और न जाने कितने और प्रकार के प्रभार चुकाए बिना साइन तक नहीं कर सकते। सभी जगह व्यवसाय ठप हो रहे हैं, सब प्राइम संकट के चलते नहीं वरन महज इसलिए कि ज्यादातर लोग नई लीज किराए की दरें और करों को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
कीमतों में उछाल आना भयावह है लेकिन यह और भी ज्यादा डरावना है कि यह सब सिर्फ लोक-कल्याण के नाम पर जबरन हम पर लादी गई सरकारी नीतियों के चलते हो रहा है। यह बदतर है क्योंकि शासकीय कर्मी, जो संभवत: सबसे ज्यादा तिरस्कृत हैं, को आपकी और हमारी जिंदगी को दस गुना बदहाल बनाने के लिए पुरस्कृत किया जा रहा है। यह बदतर है क्योंकि पहले तो सरकार स्थानीय व केंद्रीय स्तर पर करों के नाम पर हमसे छीनती है और फिर इस धन को अपव्ययी तरीके से खर्च करती है जो गलत दृष्टांत पेश कर आम आदमी को नैतिकता से विमुख करता है, जो सरकारी कर्मचारियों को जबरन घूस देने के बाद यही सिखाता है कि अपने बैंक ऋणों का पुनभरुगतान न करना ही ठीक है।
आखिर में हमारे जैसे बाकी मूढ़मति लोग, जो अपने बैंक ऋणों और करों का नियमित भुगतान करते हैं, क्या कर सकते हैं? मेरे विचार से कुछ नहीं। सिवाय बढ़ती कीमतों के काले साए के साथ जीना सीखकर और यह महसूस कर कि हम भारत माता की लाडली संतान नहीं हैं। यहां राजनेता, शासकीय कर्मी, पार्टी कार्यकर्ता और खास वोट बैंक पर ही दुलार बरसता है और बरसता रहेगा।