विकास मंत्रवर्ष 1968 में मैक्सिको ओलिंपिक खेलों के दौरान दुनियाभर को विचलित करने वाला विरोध प्रदर्शन भी हो चुका है। 1968 के विरोध प्रदर्शन में भी एक ऐसा खिलाड़ी शामिल था जिसका सरोकार उन परिस्थितियों के साथ नहीं था जिनके खिलाफ अन्य दो खिलाड़ियों ने सार्वजनिक रूप से विरोध प्रदर्शित किया था। उस दिन ऑस्ट्रेलिया के सिल्वर मैडल विजेता पीटर नॉर्मन ने गोल्ड और ब्रोंज मैडल जीतने वाले अमेरिका के दो काले खिलाड़ियों का सांकेतिक रूप से साथ देकर अपने खेल जीवन को बलि पर चढ़ा दिया था। उन काले व्यक्तियों में एक व्यक्ति का नाम टॉमी स्मिथ था जिसने मैक्सिको के उन खेलों में 200 मीटर की दौड़ में गोल्ड मैडल जीता था। दूसरा व्यक्ति जॉन कालरेस था जिसने ब्रोंज मैडल जीता था। जब यह दोनों खिलाड़ी अपने पदक प्राप्त करने के लिए आगे आए, तो दोनों के पांव में जूते नहीं थे। हां, उन्होंने अश्वेत समुदायों के बीच फैली गरीबी की प्रतीक काली जुराबें जरूर पहनी हुई थीं।
इसके अतिरिक्त टॉमी स्मिथ ने गले में काले रंग का स्कार्फ यह दिखाने के लिए पहना था कि उन्हें अपने काले होने पर गर्व है। दूसरी तरफ कालरेस ने अपने गले में अनेक मनकों की एक माला पहनी हुई थी, जो उन काले और गुलाम लोगों को समर्पित थी जिनकी मौत के बाद किसी प्रार्थना सभा का आयोजन नहीं किया गया था। संयोग से पदक वितरण समारोह के लिए जब ये दोनों खिलाड़ी आए, तो कालरेस अपने काले दस्तानों को भूल गए थे। इस दुविधा को दूर करते हुए पीटर नॉर्मन ने उन्हें सुझाया कि वह दोनों एक-एक दस्ताना पहनें।
परिणामस्वरूप जब पदक वितरण के पश्चात गोल्ड मैडल विजेता के देश अमेरिका की राष्ट्रीय धुन बजाई गई, तो उस समय दुनिया ने देखा कि स्मिथ ने दस्ताने वाली दाई मुट्ठी बंद कर हवा में लहराई हुई थी और कालरेस ने उसी प्रकार दस्ताने वाली बायीं मुट्ठी हवा में लहराई हुई थी। दोनों ही खिलाड़ियों ने अपने सिर झुकाए हुए थे। नॉर्मन ने उनके साथ सहानुभूति दिखाते हुए खेलों में नस्लवाद का विरोध करने वाली संस्था ओलिंपिक प्रोजेक्ट फॉर ह्यूमन राइट्स के बैज पहने हुए थे।
इसे देख अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के श्वेत मीडिया और संगठित समाज ने इन तीनों के खेल जीवन को समाप्त करने के हरसंभव प्रयास किए गए। कालांतर में उनके योगदान को मान्यता भी प्राप्त हुई और जब 3 अक्टूबर 2006 को ऑस्ट्रेलिया में पीटर नॉर्मन की मत्यु हुई, तो उसके उन साथियों ने उसके ताबूत को कंधा देने के लिए ऑस्ट्रेलिया का सफर तय कर उस खिलाड़ी के प्रति अपना सम्मान प्रकट किया था। यह घटना पिछले दिनों ल्हासा में हुए विरोध की पृष्ठभूमि में इस कारण याद करनी जरूरी है क्योंकि भारतीय फुटबॉल टीम के कप्तान बाइचुंग भूटिया ने तिब्बत के लोगों के समर्थन में उस ओलिंपिक मशाल को उठाकर दौड़ने में अपनी असमर्थता प्रकट कर दी है। भूटिया के इस निर्णय की अनेक दिग्गज खिलाड़ियों ने आलोचना की है।
खेलों और राजनीति को अलग रखने का यही सबक टॉमी स्मिथ और जोन कालरेस को भी सिखाया जाता था। यदि उस सबक को उन्होंने सीखा होता तो अक्टूबर 1968 की उस शाम को वह उस हिम्मत को नहीं जुटा पाते जिसके कारण दुनिया के सामने अफ्रीकी मूल के लोगों के साथ प्रतिदिन होने वाले भेदभाव को रखा। यह एक ऐतिहासिक सचाई है कि दुनियाभर में बड़े-बड़े बदलाव साधारण लोगों द्वारा उस नैतिक हिम्मत के प्रदर्शन से लाए जाते हैं जो सामान्य जीवन में दिखाई नहीं देती।
पिछली शताब्दी के पचास के दशक में 42 वर्ष की रोजा पार्क्स को जब लोकल बस में एक गोरे व्यक्ति के लिए सीट खाली करने के लिए कहा गया, तो उसने उसी नैतिक शक्ति के बल पर उसका विरोध किया और वहीं से वह प्रक्रिया प्रारंभ हुई जिसे मार्टिन लूथर किंग ने नेतृत्व प्रदान कर अमेरिका के अश्वेत लोगों को मानवाधिकार दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया। अमेरिका में सामाजिक अन्याय के विरुद्ध कई स्तर पर लड़ाई लड़ी जा रही थी। कैसियस क्ले मोहम्मद अली बनकर काले लोगों को एक नई पहचान देने का संकल्प उठा चुका था।
मैल्कम एक्स बंदूक के सहारे समाज में बदलाव लाने के लिए संघर्ष कर रहा था। इसी वातावरण में जब टॉमी स्मिथ और जोन कालरेस ने अपने तरीके से एक श्वेत चमड़ी और दूरदराज के खिलाड़ी साथी के समर्थन से अपने तरीके से विरोध प्रकट किया, तो उससे बदलाव की एक ऐसी आंधी प्रारंभ हुई जिसके सुखद परिणाम आज अमेरिका में बराक ओबामा की राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी के रूप में देखे जा सकते हैं। बाइचुंग भूटिया का विरोध भले ही एक ऐसी तूती क्यों न हो जिसे बहुत कम लोग सुन सकें, इसके बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया का कोई भी समाज जब एक लंबे समय तक किसी अधिकार के लिए संघर्ष करता है तो वह इस बात का प्रमाण होता है कि उसकी उस संघर्ष और उससे जुड़े मानवीय मूल्यों एवं सिद्धातों में गहरी आस्था है।
-लेखक वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं।