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भारत में रहने वाला गैर भारतीय उपभोक्ता

भारत में उपभोक्ताओं का एक तबका है जिसे अंग्रेजी में आरएनआई यानी रेसीडेंट नॉन इंडियन कहा जा सकता है। कौन है यह? यह दूर देशों की यात्रा कर चुका है और जीवन की अच्छी चीजों का आनंद ले चुका है।

वह कॉकटेल शामों के किस्से सुनाते नहीं थकता। वह विदेशी ब्रांडों को बड़ी जल्दी अपनाता है। जब केलॉग ने भारत में दुकान नहीं खोली थी, उसका परिवार कांफ्रेंस के लिए न्यू ओरलींस जाने वाले पड़ोसी से केलॉग के कॉर्न फ्लेक्स मंगवाना नहीं भूलता था। उसकी ड्रेसिंग टेबल पर दुनिया भर की परफ्यूम हैं। फ्रिज में चीज (पनीर) भरी हैं। मेहमानों को गर्मियों में टैंग और सर्दियों में मैक्सवेल हॉउस कॉफी पेश की जाती है।

इस आरएनआई बाजार में भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए भी जगह है। बशर्ते उन्हें उच्च कोटि का, नया और शानदार होना होगा। कीमत डॉलर में हो तो और अच्छा। सैटेलाइट टेलीविजन चैनलों पर बेहद खूबसूरत और आकर्षक विज्ञापन से उन्हें लुभाया जा सकता है। ऐसे उपभोक्ताओं के लिए विदेशी ब्रांडों के भारत आने का सिलसिला पिछले दशक में शुरू हुआ। अब तो खैर बहुत सारे ब्रांड आ गए हैं।

जाहिर है, आरएनआई उपभोक्ता खासा खुश है। दूसरी ओर, भारतीय ब्रांड भी सात समुंदर पार कर विदेश पहुंचे। उपमहाद्वीप (पाकिस्तान सहित) के कुछ उद्यमी पूरे जोश-खरोश के साथ साठ और सत्तर के दशक में अपने ब्रांड विदेश ले गए थे। वहां वे उपभोक्ताओं की नजर में चढ़े और स्थापित हो गए। अब ये ब्रांड भी घर वापसी चाहने लगे। सिंगापुर की प्रसिद्ध कोमल विलास रेस्त्रां श्रंखला ने चेन्नई में दुकान खोली। कांचीपुरम इडली ने भी चक्र पूरा किया। मुस्तफा गोल्ड मार्ट भी चेन्नई में खुल गया है। -लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसल्टेंट हैं।





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