नई दिल्लीघटते जंगलों के दौर में वन्य प्राणियों के लिए सबसे महफूज जगह चिड़ियाघर मानी जाती है, लेकिन भारत में यही उनके लिए ‘मौत का घर’ बन गए हैं। देश में 169 मान्यता प्राप्त चिड़ियाघरों में हर साल बड़ी संख्या में लुप्तप्राय और अन्य जानवर मौत के मुंह में पहुंच जाते हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण के आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले दशक में अधिकांश बंगाल टाइगरों की मौत चिड़ियाघरों में हुई।
शेर, भारतीय गेंडा और तेंदुआ की भी स्थिति इससे अलग नहीं है।
तर्क और सच्चाई:
* तर्क : प्राधिकरण के अधिकारियों का दावा है कि अक्सर 12 या 13 साल की उम्र के बाघ या तेंदुओं को चिड़ियाघर में लाया जाता है, इसलिए वे जल्दी ही मर जाते हैं।
* आशय : इस दलील से अधिकारियों का आशय यह है कि इस उम्र के बाद बाघ या तेंदुओं के लिए जीने की बहुत ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती, इसलिए अगर वे चिड़ियाघर में मरते हैं तो यह एक प्रकार से प्राकृतिक मौत ही होती है।
* सच्चाई : बंद बाड़े या चिड़ियाघर में एक बाघ की औसत आयु 22 साल है। यानी अगर उन्हें 12-13 साल की उम्र में चिड़ियाघर लाया जा रहा है तो इसके बाद भी कम से कम एक दशक तो उन्हें जीना ही चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता।