विकास मंत्र वे तब चीफ इंजीनियर थे और मेरे बैचमेट के सगे चाचा थे। मैं जब भी उनसे मिलने जाता, वे लपककर मिलते थे। लेकिन इस बार, जबकि उनके रिटायरमेंट के ढाई साल के लगभग हो चुके थे, मुझे उनसे मिलने के लिए उनके ड्राइंग रूम में लगभग एक घंटा इंतजार में अकेले बिताना पड़ा।
दरअसल बात यह थी कि वह सुबह का वक्त था और वे पूजा कर रहे थे। यह सूचना मेरे लिए उतनी ही अविश्वसनीय थी, जितनी अविश्वसनीय यह कि सूरज रात में निकलता है और चांद दिन में। वस्तुत: वे घोर यथार्थवादी थे। विज्ञान के विद्यार्थी थे और मार्क्सवाद के अध्ययन के कारण वे धर्म, भावना, मनोरंजन, कला और संस्कृति से धीरे-धीरे न केवल कटते चले गए थे, बल्कि उनके कट्टर आलोचक और विरोधी भी हो गए थे।
वे खुद को खुलेआम नास्तिक कहने में गर्व का अनुभव करते थे तथा आस्तिकों को हिकारत की नजर से देखते थे। ऐसे में मेरा चौंकना स्वाभाविक था।
वे आए और हम लोगों की जमकर चर्चा हुई। उनकी दो बेटियां थीं और दोनों ब्याहकर चली गई थीं। पद का रौब भी चला गया था। अब वे अकेले थे। स्वास्थ्य गिर रहा था। ऐसे में उनको एक सहारे की जरूरत थी। एक ऐसे सहारे की, जिसके जरिए वे अपने अकेलेपन को भर सकें, जिस पर भरोसा करके वे निर्भय हो सकें।
इनसे भी ऊपर यह कि जिसकी चिकनाई का लेप वे अपने मन पर करके रूखेपन और सूखेपन को हरे और गीलेपन में तब्दील कर सकें। तब, जबकि मेरा बुढ़ापा मुझसे काफी दूर है, मुझे आस्तिकता की सही परिभाषा का बोध हो गया है। यह परिभाषा थी-आस्तिक यानी आस्था। यह जरूरी है और हरेक के लिए हर क्षण जरूरी है, फिर चाहे वह किसी के प्रति क्यों न हो।
-लेखक समय एवं जीवन प्रबंधन के विशेषज्ञ हैं।