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आज के माता-पिता चल पड़े हैं नई डगर पर

लोगों को अक्सर यह कहते हुए सुना जाता है कि वे अपने माता-पिता की तरह बनते जा रहे हैं। जब कोई मस्तमौला, बिंदास लड़की मां बनती है तो उसे याद आता है कि उसकी मां उसे ताकीद किया करती थीं कि ‘जब तुम्हारे खुद के बच्चे होंगे, तब तुम्हें पता चलेगा।’ जो लड़के अपने पिता के झुकते कंधों पर हंसते हुए कहते थे कि वे कभी इस चूहादौड़ का हिस्सा नहीं बनेंगे, अब अपने को आईने में देखते हैं तो उन्हें जिंदगी की भागदौड़ में शामिल ऐसा ही इंसान नजर आता है जिसकी छवि आश्चर्यजनक ढंग से अपने पिता से काफी मिलती है।

अब परिस्थितियां बदल रही हैं। आधुनिक जीवन में जहां अभिभावकों पर अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देने, उन्हें आर्ट क्लास में दाखिल कराने का दबाव रहता है, वहीं उन्हें अपनी जिम्मेदारियों की खातिर यह भी सुनिश्चित करना होता है कि उनका इन्क्रीमेंट मुद्रास्फीति से अधिक हो। इन सबके अलावा आज के अभिभावकों को यह भी सुनिश्चित करना होता है कि वे कूल, टैक्नो-सावी हैं और देखने-सुनने में पुराने लोगों जैसे नहीं हैं। उन्हें ब्रांड कांशस होना पड़ेगा और लेटेस्ट जींस के साथ-साथ कॉकटेल्स के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए।

इससे पहले कभी किसी जेनरेशन की गुजरती पीढ़ी और तेजी से आगे बढ़ती नई पीढ़ी के बीच सैंडविच जैसी हालत नहीं हुई। पहले की पीढ़ी के अभिभावक एक ही तरह के रोजगार से जुड़कर संतुष्ट रहते थे और उनकी भूमिकाएं कहीं बेहतर तरीके से परिभाषित होतीं। पिता नौकरी पर जाते, घर में वेतन लाते। माताएं(आमतौर पर) घर पर रहतीं और उनका काम यह देखना होता कि लंच बॉक्स रख दिया गया या होमवर्क पूरा हुआ है या नहीं। सब्जी वाले, धोबी और कामवाली बाई से लेन-देन या काम करवाना उन्हीं के जिम्मे होता। उस जमाने में ऐसे अभिभावक नहीं होते थे, जिनसे आप शिक्षा, कैरियर या कभी-कभार राजनीति के बारे में बात कर सकें।

बच्चों को भी अपनी भूमिका पता थी। उन्हें अध्ययन करना और पूर्व-निर्धारित कैरियर के हिसाब से खुद को तैयार करना होता। शेफ, फिल्म अभिनेता या उद्यमी? इन्हें अच्छा कैरियर विकल्प नहीं माना जाता और पुत्रियां तो कुछ भी नहीं चुनती थीं। एक ही पीढ़ी के अंतराल में इतना कुछ बदल गया। जो लोग इस तरह के माहौल में पले-बढ़े हैं, उन्होंने अपने माता-पिता की कई सनक और कमजोरियों को तिलांजलि दे दी है।

वे नई तकनीकों, विचारों और जीवन-मूल्यों को अंगीकार करना चाहते हैं। एक पिता कहेगा- ‘बच्चे जो भी करना चाहें, करें। इसी में मेरी खुशी है।’ एक मां की चाहत होगी- ‘मेरी बेटी स्वतंत्र माहौल में पले-बढ़े और उसे दुनिया की हर वह खुशी मिले, जो मुझे नहीं मिल सकी।’ माता-पिता का यही साझा राग है- ‘हम आपस में दोस्त हैं और हमें अपने बच्चों पर पूरा भरोसा है।’

इसके साथ-साथ हम आर्थिक और तकनीकी जगत में हो रहे अभूतपूर्व बदलावों को भी देखें। इससे पहले कभी इतनी व्यापक मात्रा में माल और सेवाएं हमारे लिए उपलब्ध नहीं थीं। आज आप दुनिया की सैर करते हुए खुलकर पैसा खर्च कर सकते हैं और वह भी शॉपिंग की झंझट में पड़े बगैर।’ जहां तक इंटरनेट की बात है तो इसने अपनी शब्दावली और संस्कृति गढ़ ली है। हमें यह देखकर बहुत गर्व महसूस होता है कि हमारा पांच साल का बेटा ऑनलाइन चैटिंग के बारे में भलीभांति जानता है।

लेकिन इसने हम पर काफी दबाव भी बढ़ा दिया है। अब हमें अपने बच्चों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। जब किशोरवय पुत्री कहती है- ‘डोंट बी अनकूल डैड’, तो पिता को खुद पर संदेह व र्श्िमदगी होने लगती है। आपका पुत्र कृपालु होते हुए कहता है- ‘लाइए डैड! मैं आपको बताता हूं कि आपका सेलफोन कैसे काम करता है।’ आपको कोई कार खरीदने से पहले सौ बार सोचना होगा, हो सकता है परिवार की स्वीकृति न मिले।

इसलिए आप उनमें शामिल हो जाते हैं। खुद के लिए एक आई-पॉड खरीदते हैं और अपने बच्चे को इसमें कुछ लेटेस्ट म्यूजिक लोड करने के लिए दे देते हैं इस अनुरोध के साथ कि इसमें आपके पुराने किशोर कुमार के कुछ गीतों को भी शामिल कर लिया जाए। अब आपके वार्डरोब में कई तरह के जींस और टी-शट्र्स होते हैं। अपने पड़ोस के हेयर कटिंग सैलून में जाने की बजाय आप किसी ट्रेंडी यूनिसेक्स पार्लर में जाते हैं और मालिश व कटिंग के एवज में इतनी रकम दे आते हैं, जितनी कभी आपके पिता की आखिरी तनख्वाह रही होगी। आप खुद को ‘कूल’ समझते हैं, क्योंकि अब आप दूसरों से घुलमिल सकते हैं।





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