भोपाल.राज्य सरकार ने गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) जीवन यापन करने वाले लोगों के सूचना के अधिकार में कटौती कर दी है। उन्हें चाही गई जानकारी तभी आसानी से मिल पाएगी, जबकि वह उनसे सीधे संबंधित हो। जानकारी मुफ्त देने के बजाय फीस वसूली का रास्ता भी निकाल लिया गया है। सूचना अधिकारी अब तीन दिन के बजाय 15 दिन में ये बताएंगे कि जानकारी कब मिलेगी और फीस क्या होगी। आयोग एक माह के बजाय छह महीने में मामले निपटा सकेगा।
सामान्य प्रशासन विभाग ने चार अप्रैल को जारी आदेश में केन्द्र सरकार के सूचना के अधिकार अधिनियम, २क्क्५ के तहत बने मप्र सूचना का अधिकार फीस तथा अपील नियम, २क्क्५ में संशोधन किया है। अब गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले (बीपीएल) व्यक्ति को चाही गई जानकारी तभी आसानी से मिल पाएगी, जबकि वह सूचना उससे संबंधित होगी। उसे दी जाने वाली जानकारी की फोटोकापी उपलब्ध कराने में भी बंधन लगा दिए गए हैं।
नियम में संशोधन के मुताबिक यदि सूचना उससे सीधे जुड़ी हुई नहीं है और ए-४ साईज के ५क् पेजों तक सीमित है तो ही फोटोकापी दी कराई जाएगी बशर्ते चाहे गए अभिलेख सुरक्षा के लिए अहितकर न हों। इसी प्रकार यदि सूचना ५क् पेजों से अधिक है तो फोटोकापी देने के बजाय बीपीएल आवेदक से सिर्फ अभिलेखों का निरीक्षण करने को कहा जाएगा। बीपीएल आवेदक को मुफ्त में फोटोकापी देने के नियम को भी अब सशुल्क करने का रास्ता निकाल लिया गया है।
संशोधन के मुताबिक यदि मांगी गई जानकारी किसी अन्य अधिनियम या नियम के तहत सशुल्क है तो वह शुल्क बीपीएल व्यक्ति को देना होगा। यानी सूचना के अधिकार के तहत भी शुल्क वसूला जाएगा। यह प्रावधान भी किया गया है कि यदि सूचना आयोग ने सूचना नहीं देने पर किसी को निर्धारित २५क् रुपए दंडित किया है तो संबंधित विभाग के लोक सूचना या सहायक लोक सूचना अधिकारी को एक माह के अंदर यह राशि आयोग के पास जमा कराना होगी। अन्यथा उनके खिलाफ आरआरसी जारी की जाएगी।
चालान भी चलेगा:
संशोधित नियमों में सूचना के अधिकार आवेदन के साथ दस रुपए के नान जूडिशियल स्टांप के अलावा खजाना चालान की मूल प्रति लगाने का भी प्रावधान कर दिया है यानी अब चालान भरकर भी निर्धारित फीस अदा हो सकती है।
राज्य सरकार नियमों में उसी सीमा तक संशोधन कर सकती है, जितना अधिकार मूल अधिनियम में उसे मिला है। नियमों में ताजा संशोधनों को मैंने अभी नहीं देखा है, लेकिन यदि वे एक्ट के दायरे में तो ही आयोग उन्हें मानेगा, अन्यथा नहीं।
- पीपी तिवारी, मुख्य सूचना आयुक्त, राज्य सूचना आयोग