दृष्टिकोण सुरक्षा को बनाए रखने के क्षेत्र में नई चुनौतियों और अवसरों के साथ २१वीं सदी की शुरुआत हो चुकी है। प्रमुख चुनौतियां हैं-जलवायु परिवर्तन, पेट्रोलियम आधारित ऊर्जा की बढ़ती कीमतों के कारण ईंधन उत्पादन के लिए खेतों का बदलता स्वरूप, कृषि की प्रगति के लिए आवश्यक इकोलॉजी को होती क्षति और निर्बाध रूप से पनपते कीटनाशक। सौभाग्य से विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र, विशेष रूप से बायोटेक्नोलॉजी, सूचना और संचार तथा अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में हुई नई खोजों ने, इकोलॉजी को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना एक लंबी हरित क्रांति के युग की शुरुआत करने के नए अवसर उपलब्ध कराए हैं।
जहां तक जलवायु परिवर्तन का सवाल है, वहां बढ़ता तापमान, घटती वष्र के कारण बार-बार पड़ता सूखा, बाढ़ की बढ़ती घटनाएं और अंटार्कटिक तथा आर्कटिक क्षेत्रों में बर्फ की चादरों के पिघलने से चढ़ता समुद्र स्तर जैसे कुछ चिंताजनक पहलू हैं। वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की बढ़ती मात्रा ने विशेष रूप से बागवानी में कुछ अवसर उपलब्ध कराए हैं।
इन अवसरों और चुनौतियों का सामना करने के लिए विशेष रूप से शोध की शुरुआत करनी होगी। उचित डोनर्स से बाढ़, सूखा और समुद्री लवणता को सहन करने में समर्थ जीनों को प्रवर्तित करना होगा। धान जलवायु परिवर्तन वाले क्षेत्रों की मुख्य फसल बन सकता है, क्योंकि विभिन्न जलवायु की दशाओं में बढ़ने की क्षमता इसमें अधिक है। बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में तैरते धान की फसलों की पैदावार हो सकती है।
वे विषाणु जो निर्बाध गति से फैलते हैं जैसे एवियन एन्फ्लुएंजा के वायरस एच५एन१, उनकी रोकथाम के लिए हमें अपनी निगरानी और चेतावनी प्रणाली को मजबूत बनाने की जरूरत है।प्रतिरोधी जीनों को खोजने के लिए जांच-पड़ताल की सुविधाओं को बढ़ाने की जरूरत है।
नई हरित क्रांति के मानकीकरण के लिए जैविक और हरित कृषि के दो रास्तों को अपनाने की जरूरत है। सामान्यत: जैविक कृषि में खनिज उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों और जेनेटिकली मोडीफाइड फसलों की प्रजातियों का उपयोग नहीं किया जाता। हरित कृषि में, समाकलित कीट प्रबंधन, पौष्टिक तत्वों और समुचित फसल की प्रजातियों का फसल उत्पादन में उपयोग किया जाता है।
जैविक कृषि पद्धति को नई जेनेटिक्स के साथ फसल-पशुधन को शामिल करने की जरूरत है। पर इसके लिए वैश्विक बायोटेक्नोलॉजी विनियामक व्यवस्था का सहमत होना आवश्यक है और जिसका आधार पर्यावरण की सुरक्षा, उपभोक्ता का स्वास्थ्य तथा देश की बायो सुरक्षा होनी चाहिए। बायोटेक्नोलॉजी की विधाओं जैसे सेल, टिश्यू संवर्धन और डीएनए टेक्नोलॉजी की मदद लिए बगैर वर्तमान में उभर रही चुनौतियों का सामना करना कठिन होगा।
एक दूसरा क्षेत्र जिस पर बहुत ज्यादा ध्यान दिए जाने की जरूरत है वह है तकनीक के विकास से लेकर उसके प्रचार-प्रसार तक महिलाओं को मुख्यधारा में शामिल करना। यहां विज्ञान में महिलाएं और महिलाओं के लिए विज्ञान आंदोलन शुरू करने की बड़ी संभावना है। देखा जाता है कि विश्वविद्यालयों में हुए सभी दीक्षांत समारोहों में छात्राएं ही सामान्यत: टॉपर रही हैं। महिलाओं ने ही सबसे अधिक मैडल प्राप्त किए हैं और शैक्षिक पहचान के अन्य क्षेत्रों में भी महिलाएं ही आगे रही हैं।
इसके बावजूद पढ़ाई के बाद के जीवन में वे उस सीमा तक योगदान देने के योग्य नहीं रह जातीं जितना वे दे सकती हैं या जितना वे खुद भी देने की उम्मीद करती हैं। भारतीय विज्ञान कांग्रेस के लंबे इतिहास में कुछ ही महिलाएं इसकी अध्यक्ष चुनी गई हैं। इसी प्रकार बहुत कम महिलाएं ही विश्वविद्यालयों की कुलपति और विज्ञान संस्थाओं की निदेशक बनी हैं। महिला विज्ञानियों की अच्छी शुरुआत और बाद में इनको बढ़ावा देने के बीच इतना अंतर क्यों है? हमें कोशिश करनी चाहिए कि कृषि, दवाओं और उद्योग के क्षेत्र में महिलाएं और पुरुष बराबर का योगदान दे सकें।
१९८१ में मैंने नीतियों में परिवर्तन की जरूरत पर एक पेपर तैयार किया था, जिससे कि महिला वैज्ञानिकों के पास भी अपना योगदान देने का बराबर अवसर हो। इस नीति का एक महत्वपूर्ण भाग यह होगा कि अगर एक नवविवाहित महिला वैज्ञानिक तुरंत मातृत्व का विकल्प चुनती है तो उसे पांच साल की छुट्टी की सुविधा मुहैया कराई जाएगी।
बच्चे की जरूरतों पर ध्यान देने के बाद जब वह महिला वैज्ञानिक वापस आती है तो उसे विज्ञान और तकनीक के क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों पर अपनी पकड़ बनाने और समर्थ होने के लिए एक वर्ष का और समय दिया जाएगा और इस अवधि में उसे वेतन भी दिया जाएगा। ऐसी महिलाओं को जो व्यक्तिगत कारणों से अपने कैरियर को बढ़ा नहीं पाती हैं, के लिए मिड-कैरियर अवसर निर्मित किए जा सकते हैं। ऐसी महिला प्रोफेशनल्स बच्चों के बड़े होने के बाद विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ही अपने स्व-रोजगार के कैरियर को बना सकती हैं।
इस प्रकार के अवसरों का अनूठा उदाहरण है चेन्नई का बायोटेक्नोलॉजी पार्क। इस पार्क को इस प्रकार डिजाइन किया गया था कि यह महिला प्रोफेशनल्स और उद्यमियों को ऐसे अवसर मुहैया कराए जिससे कि वे बायोटेक्नोलॉजी के उत्पादों का निर्माण और उनकी मार्केटिंग कर सकें। इसके अतिरिक्त यह पार्क महिला वैज्ञानिकों को मालीक्यूलर तकनीक में शोध के अवसर उपलब्ध कराता है। यहां औषधीय पौधों की खेती और प्रभावी हर्बल मेडिकल उत्पादों के सूत्रीकरण का कार्य भी महिला बायोटेक्नोलाजिस्ट द्वारा किया जाता है।
हमें इस प्रकार की सुविधाओं को व्यापक पैमाने पर हर क्षेत्र में फैलाने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर हमारे देश में अनेक गृहविज्ञान के कॉलेज और महिला विश्वविद्यालय हैं। इन सभी संस्थाओं को आसपास के साइंस और टेक्नोलॉजी पार्क से पोषण, खाद्य विज्ञान और प्राथमिक कृषि उत्पादों को मूल्य संवर्धन के लिए जोड़ देना चाहिए। इसके अतिरिक्त हमें महिलाओं के लिए विज्ञान विषय पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। तकनीकी रूप से ग्रामीण महिला को समर्थ बना देने पर यहां उत्पादकता, आमदनी, फसलों के संतुलित विकास, पशुपालन, समुद्री और घरेलू मछली पालन, वानिकी और कृषि वानिकी के बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं। ग्रामीण महिलाओं को नई तकनीकी निपुणता और वैज्ञानिक ज्ञान में समर्थ बनाने के लिए हम किस तरह के कदम उठाते हैं, इसी पर हमारे देश की कृषि का भविष्य निर्भर करेगा।
-लेखक कृषक आयोग के अध्यक्ष रहे हैं।