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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur रायगढ़. लड़का वसुदेव गुप्ता खाना व व्यंजन बनाकर व बहन भूमिसुता मां-बाप का खेती में हाथ बंटाकर अपना पालन-पोषण करते हैं। २३ वर्ष बीतने के बाद भी दोनों को विकलांग कोटे से मिलने वाली सहायता नहीं मिल सकी है।
मुख्यालय से २७ किमी दूर विकासखंड पुसौर के छिछोर उमरिया में फूलचंद्र गुप्ता (६२) का परिवार निवास करता है। उनके २ लड़के-३ लड़कियां हैं। इनमें से पुत्री भूमिसुता (२४) व वसुदेव (२२) जन्म से ही मूक-बधिर हैं। पर दोनों ने विकलांगता को कभी आड़े नहीं आने दिया। ये दोनों अपने बूढ़े माता-पिता का अन्य भाई-बहनों की तरह हाथ बंटाते हैं।
पिता श्री गुप्ता ने बताया कि वसुदेव के हाथों में व्यंजन बनाने का हुनर है। वह बर्फी, लड्डू, नमकीन सभी प्रकार के व्यंजन बनाने में महारथी है। उसने 3 माह तक जामगांव के एक होटल में कारीगर का काम भी किया। उसे वहां बतौर मेहनताना प्रतिमाह २ हजार ५ सौ रुपए मिलते थे। वह सुन व बोल नहीं सकता।
दुकान में हर तरह के लोग आते हैं। ऐसे में कोई गलत बर्ताव लड़के से न हो, इसलिए वे उसे घर वापस ले आए। उन्होंने बताया कि होटल मालिक अब ३ हजार रुपए देने की बात कह रहा है। पर अब वसु को वहां नहीं भेजूंगा। उसे सिर्फ बारात व अन्य कार्यक्रमों में ही काम पर भेजता हूं। वह लकड़ी का भी काम भी जानता है, बस समझाने की जरूरत है। लकड़ी की कुर्सी, मेज व कई सामान उसने ही बनाए हैं। वहीं पुत्री भूमिसुता भी होश संभालने के साथ खेत में काम के दौरान हाथ बंटाती है। वह बोआई, कटाई व मजदूरी करती है।
झाड़-फूंक पर खर्च किए 12 हजार रुपए
शासन जहां स्वास्थ्य सुविधाओं को गांव-गांव तक देने का प्रयास कर रही है, वहीं आज भी गांवों में झाड़-फूंक से विश्वास खत्म नहीं हो पाया है। फूलचंद्र ने दोनों बच्चों का इलाज अभी तक सिर्फ झाड़-फूंक से कराया व लगभग १२ हजार रुपए खर्च कर दिए।
वे इन बच्चों के 5 साल का होने तक इंतजार करते रहे कि शायद देर से दोनों में बोल व सुनने की शक्ति आ जाए। इसके बाद पिता ने दोनों का इलाज गांव में ही झाड़-फूंक से कराया। कोई सुधार नहीं होने पर वैद्य व पंडितों को भी दिखाया। पंडित की राय पर दोनों मूक-बधिर बच्चों को इलाहाबाद ले गए व ७ दिनों तक संगम के स्नान कराया। इसके अलावा जिले में ही घरघोड़ा सहित कई स्थानों पर झाड़-फूंक कराया, पर बच्चों की श्रवण व बोलने की शक्ति नहीं लौट सकी।
बच्चों की भविष्य की चिंता
श्री गुप्ता सोमवार को अस्पताल में दोनों बच्चों का विकलांग सर्टिफिकेट बनवाने पहुंचे। वे विधायक विजय अग्रवाल के आश्वासन पर सर्टिफिकेट बनवाने आए थे। अभी दोनों की देखरेख हो रही है। पर भविष्य में इनका क्या होगा, इसकी चिंता सता रही है। इसलिए विकलांगता सर्टिफिकेट बनवाने आए हैं, ताकि शासन से मिलने वाली सहायता राशि को जमा कर दोनों का भविष्य सुरक्षित कर सकें।
शासन स्व-रोजगार के साथ दे रही पेंशन
शासन की ओर से विकलांगों को स्व-रोजगार के लिए ५ हजार से ५ लाख रुपए तक का ऋण दिया जा रहा है। यह ऋण कुछ ब्याज के साथ १क् वर्षो में अभ्यर्थी को देना है। इसके अलावा विकलांगों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के तहत २क्क् रुपए भी दिए जा रहे हैं।
शिक्षा नहीं देने का पछतावा
श्री गुप्ता ने बताया कि दोनों मूक-बधिर होने से उन्हें कभी स्कूल नहीं भेजा और न ही किसी से कोई जानकारी लेना का प्रयास किया, पर अब इसका दुख होता है। उन्होंने कहा सरकार से मिलने वाली सुविधाओं की भी जानकारी नहीं थी। यदि मालूम होता, तो बच्चों को जरूर पढ़ाता। लड़के व लड़की की शादी के लिए लोग आ रहे हैं, पर उनकी विकलांगता के चलते शादी भी नहीं कर रहा हूं। क्योंकि लड़की के नहीं सुनने व बोलने पर ससुराल वाले मारपीट करेंगे।
पंचायत का निष्क्रिय रवैया
गांव के सरपंच व सचिव को ऐसे लोगों की सहायता के लिए आगे आना चाहिए। पर २४ वर्षो में पंचायत स्तर से कोई प्रयास नहीं किया गया। श्री गुप्ता ने 6 माह पहले सचिव महेंद्र साव से विकलांग सर्टिफिकेट बनाने के लिए कहा था। पर कहने के बाद भी सचिव ने प्रयास नहीं किया।
७ से १४ वर्ष के पढ़ने वाले बच्चों के अलावा अन्य विकलांगों को पेंशन दी जा रही है। साथ ही विकलांगों को संबंधित उपकरण भी बांटे जाते हैं। विभाग सभी ९ ब्लाकों में कैंप आयोजित कर विकलांगों की डाक्टरी जांच के साथ ही उपकरण भी उपलब्ध भी कराता है।
-एम.एल. दुबे,उप संचालक-पंचायत एवं समाज कल्याण विभाग