अजमेर.
नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़ी समाज सेविका मेधा पाटकर ने कहा, राजनीति में जातिवाद का खेल समाज के लिए घातक है। उन्होंने आर्थिक आधार पर आरक्षण की वकालत करने के साथ यह भी कहा कि, जातिवादी आरक्षण व्यवस्था को खत्म करने का समय अभी नहीं आया है।
क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान द्वारा मंगलवार को जवाहर रंगमंच पर आयोजित ‘मारजोरी साइक्स स्मृति व्याख्यान’ को संबोधित करने के बाद उन्होंने पत्रकारों से कहा कि, राजनीति में धर्म व जाति पर आधारित संख्या का खेल देश व समाज के लिए खतरनाक है। इससे सरकार को प्रभावी ढंग से निपटना होगा।
पाटकर ने कहा कि, सरकारें समतावादी विकास का चेहरा नहीं दिखा रहीं हैं। उन्होंने आरक्षण को लेकर गुर्जर व मीणाओं के बीच हुए मनमुटाव को समाज के लिए घातक बताया। पाटकर का कहना था कि जो वंचित हैं उन्हें आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए लेकिन यह भी ठीक नहीं है कि हर कोई आरक्षण की मांग करे।उन्होंने आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था को सही ठहराया लेकिन यह भी कहा कि जातिवाद के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने का समय अभी नहीं आया है। समाजसेविका ने कहा कि अभी भी कई जातियां अथवा उनका अधिकांश तबका आरक्षण के लाभ से वंचित है हालांकि आखिरी उद्देश्य जातिवादी आरक्षण व्यवस्था को हटाना ही होना चाहिए।
शिक्षा पूंजीपतियों के हाथों में कैद >>
सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर ने कहा कि प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा पूंजीपतियों के हाथों में कैद हो चुकी है। उन्होंने इस बात पर हैरत जताई कि धनी लोगों के बच्चों के लिए तो धनी लोगों से जुड़े दिमाग योजना तैयार कर ही रहे हैं, लेकिन गरीब बच्चों की पढ़ाई की योजना भी धनी लोग ही तैयार कर रहे हैं।
वे मंगलवार को यहां जवाहर रंगमंच पर क्षेत्रीय शिक्षण संस्थान की ओर से ‘सामाजिकीकरण बनाम शिक्षा की राजनीति’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में बोल रही थीं।
उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात में शिक्षा के सामाजिकीकरण की बात सोची भी नहीं जा सकती है। जिस तरह पानी बेचने का धंधा चल रहा है, अब उसी प्रकार कंपनियों और पूंजीपतियों ने प्राइमरी से लेकर उच्च शिक्षा तक को कारोबार बना लिया है। कंपनियां निवेश करेंगी तो शिक्षा में बाजारवादी सोच ही सामने आएगी। पाटकर ने कहा कि शिक्षा में समता और न्याय के बिना सामाजिकीकरण की कल्पना भी बेमानी है। मौजूदा दौर में समता, न्याय और मूल्यों की सोच से परे शिक्षा का स्वरूप तैयार किया जा रहा है, जबकि देश को समान शिक्षा प्रणाली की जरूरत है।
पाटकर ने कहा कि सरकार को इस मामले में रचनात्मक भूमि निभानी चाहिए। अब पब्लिक प्राइवेट नहीं बल्कि पब्लिक- पब्लिक साझेदारी की बात करनी चाहिए। प्राइवेट कंपनियों द्वारा स्थापित स्कूलों को लेकर सरकार जितनी चिंतित है। उतनी चिंता जीवनशाला और जनशाला स्कूलों के प्रति भी रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली परिवेश, परम्पराओं, वातावरण व आम जनजीवन से जुड़ी होनी चाहिए। ऐसा नहीं हो कि बच्चे हकीकत से उलट केवल ख्याली दुनिया में ही घूमते रहें।
व्याख्यानमाला में युवाओं के सवालों का जवाब देते हुए पाटकर ने कहा कि पढ़ाई के बाद केवल एक साल का समय अपनी इच्छा के अनुसार समाज के उत्थान के लिए दें। उन्होंने माना कि कई राज्यों में खासतौर से शिक्षा में विचाराधारा थोपने का प्रयास किया गया है। विचारधारा थोपना समाज के लिए घातक है।
अध्यक्षता कर रहे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एमएस अगवानी ने कहा कि हम विजनलैस होते जा रहे हैं। यदि ऐसा ही हाल रहा तो देश का भविष्य ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता की जिम्मेदारी सरकार की होनी चाहिए। क्या यह संभव नहीं है कि केन्द्रीय विद्यालय जैसे स्कूल देश के पिछड़े और आदिवासी इलाकों में भी स्थापित हों। यह सब सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। इससे पहले रीजनल कॉलेज के प्राचार्य प्रो. बीजी जादम ने प्रो. अगवानी और पाटकर स्वागत किया।