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पुलिस नहीं, कंपनियां ढूंढेंगी गाड़ियां

चंडीगढ़अमृतसर की सिमरप्रीत गोल्डन टेंपल से माथा टेक कर जैसे ही बाहर आईं, उनके होश फाख्ता हो गए। उनकी ब्रैंड न्यू ऑल्टो कार पार्किग से चोरी हो गई थी। उन्होंने एफआईआर तो दर्ज करा दी लेकिन पुलिस कार ढूंढ नहीं पाई। तीन महीने बाद अचानक उन्हें इंश्योरेंस कंपनी से फोन आया है कि उनकी कार अंनतनाग से मिल गई है।

दरअसल कंपनी ने एकनिजी एजेंसी ‘स्टोलन व्हीकल ट्रैकर’ (एसडब्ल्यूटी) के जरिए कार को ढूंढ निकाला। एसवीटी की दस आईटी एक्सपर्ट्स की टीम है। दो महीने में इस टीम ने चोरी गई 54 गाड़ियां ढूंढ निकाली हैं। एसडब्ल्यूटी के संत कुमार शर्मा इससे पहले पत्रकारिता करते थे। अक्सर पुलिस स्टेशंस जाया करते। वहां वर्षो से खड़ी जंग लगी गाड़ियां देखकर उन्हें हैरानी होती। पुलिस की दलील होती कि ये गाड़ियां उसने शक की बिना पर जब्त की हैं लेकिन उन्हें उनके मालिकों तक नहीं पहुंचाया जा सका।

संत का कहते हैं कि वैसे भी पुलिस की प्राथमिकता इन गाड़ियों को ठिकाने पर पहुंचाना नहीं है। पुलिस के पास न तो समय है, न मैनपॉवर और न ही इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का मजबूत ढांचा। इसी से प्रेरित होकर उन्होंने चोरी गई गाड़ियों को पुलिस की मदद से पकड़ने और उन्हें उनके मालिकों या इंश्योरेंस कंपनियों तक पहुंचाने की उन्होंने सोची। एजेंसी के काम का तरीका काफी कुछ डिटेक्टिव एजेंसी जैसा है।

चोरी गई गाड़ी की हर पहलू से यह टीम छानबीन करती है। हर गाड़ी में कोई न कोई क्लू होता ही है जिससे उसकी असली पहचान ढूंढी जा सकती है। यहीं से शुरू होता है सिलसिला उसके मालिक या इंश्योरेंस कंपनी तक पहुंचने का। जैसे दुनिया में किसी के भी फिंगर प्रिंट्स एक जैसे नहीं होते, वैसे ही किसी गाड़ी का इंजन व चेसिस नंबर भी एक सा नहीं होता है। इसलिए सबसे पहले यही देखा जाता है। उसके बाद गाड़ी में कुछ न कुछ ऐसा जरूर होता है जिससे कार ओनर का कोई न कोई क्लू मिल जाता है। गाड़ी के एल्फा-न्यूमेरिक नंबरों को देखा जाता है, जिसके जरिए पता लगाया जाता है कि गाड़ी किस प्लांट से किस साल में बनी है।

ऐसे पकड़ी गई ऑल्टो:

संत बताते हैं कि सिल्वर कलर की वह ऑल्टो कार दरअसल अमृतसर से चोरी की गई थी। बिना नंबर की इस ब्रैंड न्यू कार को मजहूर खान नाम का आदमी चला रहा था। कार चोर इस पर अनंतनाग का नंबर (जेके03ए3945,नंबर) लगा कर घूम रहा था। नई गाड़ी देखकर पुलिस को कुछ शक हुआ और उसने मजहूर से गाड़ी के कागज मांगे जो उसके पास नहीं थे। पुलिस ने अनंतनाग के आरटीओ से पता लगाने को कहा।

पता लगा कि वह कार नंबर वहां की ऑल्टो सीरीज का है लेकिन इस नंबर की कार रेड वाइन कलर की है। पुलिस ने केस एसडब्ल्यूटी को दे दिया। इस टीम ने कार के इंजन व चेसिस नंबर से पता लगाया कि कार अमृतसर की है। इससे पहले इंश्योरेंस कंपनी ने उन चोरी की गाड़ियों का डाटा उक्त कंपनी को दे रखा था जिसका उसे क्लेम देना था। आईटी प्रोफेनल्स की टीम की ओर से इंजन व चेसिस नंबर इंश्योरेंस कंपनी के डाटा से मिलाने पर पता लगा कि यह कार अमृतसर की है।

एजेंसी दूसरे राज्यों में फैला नहीं काम:

इंश्योरेंस कंपनियां जिस तरह से एसडब्ल्यूटी की सेवाएं ले रही है, उसे देखते हुए एजेंसी दूसरे राज्यों में भी अपना काम फैला रही है। रिलायंस इंश्योरेंस कंपनी के रीजनल मैनेजर (क्लेम) आर.के.गोयल ने कहते हैं, ‘गाड़ियों की एफआईआर तो कराई जा चुकी है लेकिन पुलिस तो सिर्फ चोर को पकड़ेगी और गाड़ी थाने में खड़ी कर देगी। हमें तो ओनर तक पहुंचाना है और अपनी कीमत वसूलनी है। यह काम पुलिस के बजाय एसडब्ल्यूटी का है, जिसके लिए हम उन्हें गाड़ी की कुल कीमत का 10 फीसदी दे रहे हैं।’

कारण

1. पुलिस व निजी कंपनियों के इकट्ठे काम करने से काम जल्दी व बेहतर होता है 2. निजी एजेंसियों का डाटा अपडेट रहता है 3. डाटा शेयरिंग फास्ट है शक के लिए काफी हैं ये वजहें 1.गाड़ी के कागजात पूरे नहीं होना 2.ड्राइवर और गाड़ी के मालिक का संबंध नहीं होना 3.गाड़ी का नया होना 4.गाडी के कागजों पर किसी दूसरे का नाम होना 5.अलग-अलग राज्यों की गाड़ियां जो बाहरी नंबरों पर चल रही हैं

इसलिए नहीं मिलती गाड़ियां

चोरी की गाडियां इंश्योरेंस कंपनीज व मालिकों तक इसलिए नहीं पहुंच पाती हैं क्योंकि दोनों के ही पास गाड़ी का इंजन व चेसिस नंबर नहीं होते। इंश्योरेंस कंपनियां बजाय 18-19 नंबर का पूरा एल्फा-न्यूमेरिक इंजन-चेसिस नंबर लिखने के आखिर के 5-6 डिजिट्स लिख देती हैं। एफआईआर में भी नंबर पूरे नहीं होते हैं। जिससे चोरी गई गाड़ियां नहीं मिल पाती हैं। इसलिए यह डिटेक्टिव कंपनी अब इंश्योरेंस कंपनियों को इस बारे में अवेयर कर रही है।





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