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यौन शिक्षा : विषय हो या न हो

मंथन हाल ही में गुजरात के एक शहर में एक स्कूल की छात्रा ने एक शिशु को स्कूल के बाथरूम में जन्म दिया। इस घटना के साथ ही बढ़ते बच्चों के लिए यौन शिक्षा के मुद्दे पर एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया। हालांकि, Êयादातर अभिभावक इस बारे में सशंकित हैं कि विषय की बाकायदा शिक्षा ठीक असर रखेगी या नहीं।

श्रीमती मित्तल* के दो बच्चे, बारह और चौदह वर्ष के हैं। वे अपने दोनों बच्चों के समुचित, स्वस्थ विकास के प्रति बहुत सजग हैं किन्तु वे यौन शिक्षा को इसका हिस्सा नहीं मानतीं। मित्तल दंपत्ति की राय में ये बातें बच्चों से करने की हैं भी नहीं क्योंकि यौन विषयक ज्ञान की आवश्यकता विवाह उपरान्त ही होती है और तब नवदम्पत्ति के मित्रादि और मीडिया में उपलब्ध जानकारी इन आवश्यकताओं को पूरी कर देते हैं।

सुराना* दंपति भी यही मानते हैं कि यौन शिक्षा की आवश्यकता विवाहेत्तर ही होती है। फिर भी वे अपने किशोर होते बच्चे को इस विषय में अवश्य बताएंगे। उनकी सोच है कि इससे बच्चे कोई भी गलत कदम उठाने से बच जाएंगे या कम से कम उनकी नासमझी का तो कोई फायदा नहीं उठा सकेगा।

इस विषय पर मल्होत्रा* परिवार की सोच एक अन्य दिशा की ओर इंगित करती है। उनका कहना है कि हम अपने बच्चों को यौन शिक्षा देकर उनका कौतूहल इतना न जागृत कर दें कि वे उसे शांत करने के लिए स्वयं ही प्रयोग पर उतर आएं। आज फिल्म, टेलीविजन और इंटरनेट का प्रभाव कुछ ढंका-छुपा नहीं है। विभिन्न समाजों की विपरीत विचारधाराएं भी आपस में टकरा कर बहस के विषय पैदा कर रही हैं।

किसी भी प्रकार की शिक्षा का उद्देश्य होता है कि वह सीखने वाले को ऐसा वातावरण दे कि वह ज्ञान को ग्रहण कर निष्पक्ष और मौलिक चिंतन कर सके। यह चिंतन जल में फेंके गए पत्थर की तरह उसके ज्ञान का दायरा बढ़ाता चला जाए। यौन संबंधी शिक्षा का उद्देश्य भी यही होना चाहिए।

क्यों और कैसे

पहला प्रश्न तो यही है कि यौन शिक्षा की आवश्यकता है या नहीं। यदि हां, तो किस आयु से और किस पाठ्यक्रम से क्योंकि यदि अलग-अलग आयु के बालक-बालिकाओं को शिक्षा देनी है, तो विषयवस्तु, भाषा व पाठ्यक्रमों को बदलकर ही इस विषय का विकास करना पड़ेगा।

प्रश्न यह भी है कि क्या यौन शिक्षा देने का समय वय:संधि और उसके बाद का समय ही है। क्या छोटे से बालक और बालिका को तीन-चार वर्ष की उम्र से नहीं समझाना चाहिए कि हर स्पर्श सही नहीं होता। भले और बुरे स्पर्श का अंतर समझना आवश्यक है। इस प्रकार के प्रश्न केवल हमारे देश में ही नहीं उठ रहे हैं। पुरातन संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के धनी अन्य देशों इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, श्रीलंका, मंगोलिया आदि में भी एक यौन शिक्षा कार्यक्रम स्कूलों में लागू है और समाज में भी इस विषय पर चर्चा होती है।

मेलिशया, फिलीपीन्स तथा थाइलैंड जैसे देश भी यौन शिक्षा को पाठशाला स्तर पर कैसे लागू किया जाए, इसका प्रयास कर रहे हैं। पश्चिमी देशों को इस विषय में बहुत स्वछंद माना जाता है किन्तु वहां भी आवश्यकता, उपयोगिता और शिक्षित करने के तरीके पर समाज का आत्ममंथन जारी है। वर्ष २क्क्२ में काइसर फैमिली फाउंडेशन द्वारा अमेरिकी स्कूलों के प्राचार्यो के बीच किए गए सर्वे में ज्ञात हुआ है कि ३४ प्रतिशत प्राचार्यो का आज भी यही विश्वास है कि छात्रोंको केवल ब्रrाचर्य की शिक्षा देनी चाहिए। गर्भ-निरोधकों या गर्भधारणा की तो बात उठती ही नहीं है। इस प्रकार के सर्वे और मंथन की प्रक्रियाएं हमारे देश में भी जारी हैं।

स्कूल के सवाल

यदि स्कूल में यौन शिक्षा देने का मन बना भी लिया जाए तो भी एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ेगा कि यौन शिक्षा कौन देगा। सामान्यत: स्कूलों की नीति यह होती है कि जो भी पाठ््यक्रम में नया बढ़ता है, उसकी जि़म्मेदारी वो कार्यरत शिक्षकों पर डाल देते हैं। लेकिन यौन शिक्षा के साथ ऐसा करना घातक होगा। इतिहास या गणित बहुत अच्छा पढ़ाने वाले शिक्षक यौन शिक्षा वाले पीरियड में हो सकता है कि खुद ही बगले झांकते नज़र आएं। यौन शिक्षा जैसे नाज़ुक विषय के लिए स्कूलों को आवश्यकता होगी यथोचित संख्या में प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की और यहीं समस्या खड़ी हो जाएगी संसाधनोंे की।

यौन शिक्षा कैसे दी जाए इस प्रश्न ने भी कई विचारों, सर्वे और उत्तर-प्रत्युर को जन्म दिया है। स्कूल की समय-सारिणी में नियमित समय दे दिया जाए, तो इस बारे में अलग-अलग विचार हैं। लेकिन यौन शिक्षा के सत्र लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग किए जाएं, इस बात पर तकरीबन राय समान है।

पश्चिमी देशों के सर्वे में भी पाया गया है कि केवल बालक या केवल बालिका समूहों में ही छात्र व छात्राएं खुलकर बातचीत कर सकें और ज़्यादा स्पष्ट तौर पर अपनी जिज्ञासाओं को सामने रखकर समाधान पा सके। सर्वे व शासकीय प्रयास अपनी जगह हैं किन्तु अभिभावक और शिक्षक जब तक अपने अनुभवों और परिस्थितियों के अनुसार इस विषय पर चर्चा व मंथन नहीं करेंगे, तब तक भारतीय समाज व संस्कृति के अनुरूप कार्यवाही नहीं हो पाएगी।





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