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तय कौन करे

माधवी महाविद्यालय में प्राध्यापक है। उसकी प्रतिभा को देखते हुए उसे दूसरे कॉलेज में बतौर अतिथि प्राध्यापक आमंत्रित किया गया। माधवी ने तुरन्त पति को फोन लगाकर पूछा। पति ने उसकी ज़िम्मेदारियों और समय का हिसाब लगाकर कहा कि फिलहाल इसे अस्वीकार कर दे और माधवी ने यही किया।

कृष्णा के घर रोज़ सुबह रद्दीवाला इस आस से आता है कि सामने रखी रद्दी मिल जाए। पर कृष्णा इसे ससुरजी से पूछकर, उन्हीं के सामने बेचना चाहती है और वे सुबह मंदिर चले जाते हैं। अनुजा को अक्सर नए कपड़े खरीदने के बाद बदलवाने जाना पड़ता है क्योंकि वह घर में, सहेलियों को सबको दिखाती है और कोई भी कपड़ों के बारे में नकारात्मक टिप्पणी कर दे, तो वह विचलित हो जाती है।

महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रणी हैं, सफलता के परचम लहरा रहीं है, बहुत कुशलता से घर-बाहर के दायित्वों का प्रबंधन कर रहीं हैं, फिर क्यों फैसले की घड़ी सामने आते ही बहुत बार पैर ठिठक जाते हैं? नज़रें तलाशने लगती हैं, एक ऐसा व्यक्ति जो उनकी एवज में चुनाव कर ले, राय दे दे या कुछ नहीं तो उसके फैसले पर सम्मति की मुहर ही लगा दे। खुद को असमंजस की स्थिति में पाना स्त्रियों के लिए आम बात है।

बच्चों की शादी या मकान बनवाना जैसे बड़े निर्णय तो छोड़िए, टूथपेस्ट कौन-सी कंपनी का लेना है, घर में सब्ज़ी कौन-सा बनेगी, यहां तक कि वे क्या पहनें, यह तक खुद तय करने में वे हिचकती हैं। अमूमन स्त्रियां यही चाहती हैं कि कोई और उनके लिए निर्णय ले ले और वे इस दुविधा से निजात पा जाएं। महिलाएं फैसले नहीं ले पाती हैं, यह लगभग सर्वमान्य तथ्य के रूप में स्वीकार्य है। ज़ाहिर है, यह कोई नैसर्गिक अक्षमता नहीं है। फिर क्यों, कैसे हम अपने आस-पास ऐसा जाल बुनते जाते हैं? कारणों को मोटे तौर पर दो स्तरों पर परखा जा सकता है-

बाह्य कारक

पुरुष-प्रधान समाज में कभी भी स्त्री को वह स्थान हासिल नहीं हुआ, जिस पर बैठकर वह साधिकार कह सके, ‘फैसला हो चुका।’ ये शब्द हमेशा से पुरुष-मुख से ही सुने जाते रहे हैं। औरतें इन फैसलों को सुनने और मानने की आदी होती गईं और बेटी, बहू, पत्नी, मां से यही उम्मीद की जाती रही कि वह इस ‘आदत’ को ‘संस्कार’ की तरह अगली पीढ़ी को सिखाती रहें। लेकिन कुछ वर्षो पहले तक स्थिति इतनी विकट नहीं थी, वजह थी, स्पष्ट कार्य-विभाजन। घर के बाहर पुरुषों का राज था पर घर के भीतर झांकने की उन्हें न फुर्सत थी, न ज़रूरत। रोज़मर्रा के कामों में पुरुषों का कोई खास दखल नहीं होता था। अब स्थिति जटिल होती जा रही है।

कार्य-क्षेत्र की विभाजन रेखा धुंधली पड़ती जा रही है पर स्त्रियों का मूल स्वभाव और उनके प्रति आम धारणा उस तेज़ी से नहीं बदली है। इस घालमेल ने स्त्री की मुश्किल और बढ़ा दी है। घर के जिन छोटे-छोटे मसलों में वह बिना पूछे निर्णय कर लेती थी, वहां सबका प्रवेश हो चुका है। वह कोई फैसला ले, उससे पहले दूसरों का हस्तक्षेप हो जाता है। बाकी मामलों में उसकी राय को गंभीरता से नहीं लिया जाता और इसलिए फैसलों को भरोसे के लायक नहीं माना जाता। लोगों की यह दृष्टि उसे विचलित कर देती है।

आंतरिक कारकसामाजिक व्यवस्था के लम्बे इतिहास ने स्त्री से उसका आत्मविश्वास छीन लिया है। उसका स्व इस कदर कमज़ोर हो गया है कि दूसरे तो छोड़िए वह खुद अपने ऊपर भरोसा नहीं कर पाती है। अतिभावुकता और आत्मविश्वास की कमी के चलते मन में सही-गलत की पहचान होते हुए भी वह दुविधा में फंस जाती है। इसकी वजह है, दोषारोपण का भय। मतलब वे अपने फैसले की ज़िम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं होतीं।

कई बार उसे एक गलती पर कई दिनों बल्कि जीवन-भर सुनना पड़ता है- ‘हमने तो पहले ही कहा था’ ‘करके देख ली मन की’ ‘तुममें निर्णय लेने की समझ कहां?’ जैसी तीखी-कड़वी बातें उसके रहे-सहे स्व की भी धज्जियां उड़ा देती हैं। वह निराश हो जाती है, सहम-सी जाती है। अगली बार जब मौका आए और वह ‘जैसा आप ठीक समझें’ या ‘आप बता दें, क्या करूं’ की भाषा बोलती है, तो स्वाभाविक ही है।

आखिर हर व्यक्ति अपने किए की सराहना चाहता है, अपराध-बोध और आरोप नहीं। इसलिए फैसले का वक्त आते ही अधिकांश स्त्रियां एक कंधा तलाशने लगती हैं। वे इस मामले में न तो श्रेय चाहतीं हैं, न ही दोष। स्त्रियों का एक और स्वभाव है कि वे शांति चाहती हैं। यदि उन्हें पता है कि उनके फैसले से पुरुष अहम् को ठेस पहुंचेगी और वे इसे गलत साबित करने के और उन्हें बोलने के बहाने ढूंढते रहेंगे, तो वे इससे बचने के फैसला लेने की पहल ही नहीं करती हैं।

किसका नुकसान

खुद को सुरक्षित दायरे में बांधने या दूसरों को महत्व देने की इस कवायद में स्त्रियां कितना कुछ खोती हैं, वे खुद नहीं जानतीं। सास को हार्टअटैक आया, तब शुभ्रा घर में अकेली थी। पति का फोन लग नहीं रहा था। दूर स्थित बड़े अस्पताल ले जाए या पहले पास के डॉक्टर को बुलाए, इसी उहापोह में देर हो गई और सबने उसे ही इसका दोषी माना। फैसला गलत न हो, जाए इस डर से फैसला न लेने की सज़ा उसे मिली। पर क्या वाकई गलती शुभ्रा की थी? जो बचपन से अपनी ज़िंदगी के फैसलों के लिए दूसरों पर निर्भर रही, वह यकायक दूसरे की ज़िंदगी का फैसला खुद कैसे ले सकती थी? निर्णय न ले पाना व्यक्तित्व की एक कमज़ोरी है, जो अपनी नज़रों में और दूसरों की नज़र में आपका महत्व घटा देती है। यह महसूस भी होता है और नज़र भी आता है। इससे स्वाभिमान तो चोटिल होता ही है, साथ ही हर बार, हर बात में दूसरों पर निर्भरता बहुत असहाय-सा बना देती है। ऐसी नकारात्मक भावनाएं अंतत: असंतोष, चिड़चिड़ाहट और तनाव का कारण बनती हैं।

बच्चों के सामने मां की ऐसी छवि से उनके मन में महिलाओं के प्रति यही दृष्टिकोण विकसित होगा और यह पीढ़ियों तक जाएगा। व्यक्तिगत के अलावा यह सामाजिक विकास में भी बाधक है। एक महिला की संवेदनशीलता भरे, समझदार निर्णय, कई सामाजिक मसलों में बहुत महत्वपूर्ण ही नहीं बल्कि ज़रूरी भी सिद्ध होते हैं।

फैसला खुद करेंसबसे ज़रूरी है, अभिव्यक्ति। अपनी बात को बिना उत्तेजित हुए, शांत तरीके से सम्प्रेषित करने की कला, पहली सीढ़ी है। अपनी क्षमता और अधिकारों की जानकारी होगी, तो अपने-आप आत्मविश्वास आएगा। यह रातोंरात नहीं हो जाएगा पर एक-एक कदम तो आगे बढ़ ही सकते हैं। पहले तो पता लगाएं कि क्या आप भी निर्णय नहीं ले पाती हैं?

यदि ऐसा है, तो कुछ उपाय कर सकते हैं-

अपने लिए अगले दिन की दिनचर्या तय करें। इस पर कायम रहने की कोशिश करें। यह बिल्कुल निजी फैसला है। बिना किसी को कुछ कहे, इसे पूरा कर सकती हैं।

छोटे-छोटे फैसलों से शुरूआत करें। जैसे, जब भी कहीं जाने के लिए तैयार हो जाएं फिर किसी से न पूछें कि कैसी लग रहीं हैं। कोई बुरा कह भी दे, तो भी उस दिन तो कोई बदलाव न करें।

अगर कोई निर्णय गलत हो रहा है, तो चुप रहने से बेहतर है कि अपने विचार रखें। हां, जब भी बोलें तर्क और तथ्यों के साथ बोलें। चाहें तो अभ्यास कर लें।

अपने फैसले की ज़िम्मेदारी उठाने से पीछे न हटें। यदि फैसला गलत भी हो, तो भी इसकी वजह से अपराध-बोध से ग्रस्त न हों। हर इंसान से गलती हो सकती है। मान लें कि आपके कहने पर परिवार एक रेस्तरां में गया पर वहां का खाना अच्छा नहीं लगा। इसका मतलब यह नहीं कि आइंदा आप कोई सुझाव ही न दें।

जिस क्षेत्र में आपकी विशेषज्ञता है, वहां से शुरू करें। अगर आपको बाज़ार और वस्तुओं के मूल्यों की अच्छी जानकारी है, तो खरीदारी के समय बेझिझक होकर निर्णय लें। आप देखेंगी कि कुछ समय बाद सब लोग आपके कायल हो जाएंगे बल्कि इस मामले में आपकी राय पर निर्भर भी।

पति-पत्नी हर फैसला आपसी सहमति से लें। पति हर बात पत्नी से कहे और राय मांगे। यह स्वस्थ रिश्ता बच्चों को भी स्त्री और उसके मत का सम्मान करना सिखाएगा और बिटिया के स्व का विकास करेगा।धीरे-धीरे ये प्रयास आपके अंदर वो आत्मविश्वास ले आएंगे जो निर्णय लेने की प्रवृत्ति का आधार हैं।





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