नई दिल्लीसुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने कहा है कि यदि कार्यपालिका लोगों के प्रति अपने दायित्व पूरे नहीं करती है, तो यह अदालतों का कत्र्तव्य है कि वे लोगों के अधिकारों की रक्षा करें। इस टिप्पणी से न्यायिक सक्रियता के मुद्दे पर विधायिका व न्यायपालिका में फिर से टकराव होने के आसार पैदा हो गए हैं।
चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) विकास सिंह की उस गुजारिश के बाद की कि कार्यपालिका के आदेशों पर जनहित याचिकाएं स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। चीफ जस्टिस ने गुस्से में कहा, ‘यदि कार्यपालिका काम नहीं कर रही हो तो आम आदमी के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या वह मुख्यमंत्री के पास जाएगा?’ उन्होंने सरकार के कार्यो में अनियमितताओं के उदाहरण देते हुए दो टूक शब्दों में कहा कि लोगों के अधिकारों की रक्षा का दायित्व अदालतों का है।
दलील ठुकराई :
कोर्ट ने याचिकाकर्ता के वकील प्रशांत भूषण की यह दलील ठुकरा दी कि जनहित याचिका ग्रहण करने संबंधी दिशानिर्देश बनाने का मुद्दा पांच जजों की संविधान
पीठ को सौंप देना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘हम व्यापक दिशानिर्देश जारी नहीं कर सकते।’ अदालत ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और विधि विशेषज्ञ एफएस नरीमन से मदद करने को कहा है।
दो याचिकाओं पर उठा मुद्दा :
न्यायिक सक्रियता का मुद्दा सेक्स वर्कर व उनके बच्चों के पुनर्वास तथा विकलांगों के लिए मकानों के आवंटन संबंधी दो जनहित याचिकाओं की सुनवाई की दौरान उठा है। जस्टिस मरकडेय काटजू के न्यायिक सक्रियता पर अंकुश लगाने वाले फैसले के मद्देनजर ये याचिकाएं जस्टिस एसबी सिन्हा की अध्यक्षता वाली दो जजों की बेंच ने मौजूदा बेंच को भेजी हैं।
इस अनियमितता का क्या करें!
चीफ जस्टिस ने राज्य सरकारों की मौन स्वीकृति से चलने वाली कई अनियमितताओं की ओर भी ध्यान आकर्षित कराया:
* गरीबों को नि:शुल्क चिकित्सा देने की शर्त पर निजी अस्पतालों को कौड़ियों के दाम पर जमीन दी जाती है, लेकिन यह शर्त पूरी नहीं की जाती।
* लगभग मुफ्त जमीन हासिल करने वाले निजी स्कूलों से अपेक्षा रहती है कि 25 फीसदी प्रवेश गरीब परिवारों के बच्चों को दिया जाएगा (लेकिन ऐसा नहीं होता)।
न्यायिक सक्रियता पर फिर आमने-सामने!
चीफ जस्टिस की इस टिप्पणी को एक बार फिर से न्यायिक सक्रियता पर विधायिका व न्यायपालिका को आमने-सामने आने के तौर पर देखा जा रहा है। बालकृष्णन की टिप्पणी से ठीक पहले एडिशनल सॉलिसिटर जनरल विकास सिंह ने इस मुद्दे को यह कहकर हवा दे दी कि कार्यपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण कर हाईकोर्ट संवैधानिक मर्यादा तोड़ रहे हैं।